नई दिल्ली। देश में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क पर बड़ी कार्रवाई करते हुए जांच एजेंसी ने मुख्य आरोपी लखन जयप्रकाश जगवानी को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह कथित तौर पर अवैध कॉल सेंटरों के माध्यम से अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी करता था।
आरोपी लंबे समय से फरार चल रहा था और उसे 13 मई को दिल्ली से पकड़ा गया। जांच में सामने आया कि वह इस पूरे नेटवर्क को स्थापित करने और संचालित करने में प्रमुख भूमिका निभा रहा था।
मामला दिसंबर 2025 में दर्ज किया गया था, जिसके बाद जांच एजेंसियों ने दिल्ली, नोएडा और आसपास के क्षेत्रों में छापेमारी की थी। इसी दौरान एक बड़े अवैध कॉल सेंटर का खुलासा हुआ, जो 2022 से सक्रिय था।
यह गिरोह खुद को अमेरिकी सरकारी एजेंसियों—DEA, FBI और Social Security Administration—का अधिकारी बताकर लोगों को डराता था और डिजिटल माध्यमों से धन वसूलता था। फर्जी पहचान और वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल कॉल्स के जरिए पीड़ितों को निशाना बनाया जाता था।
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जांच में सामने आया कि इस नेटवर्क के जरिए लगभग 8.5 मिलियन डॉलर यानी करीब ₹70 करोड़ की ठगी की गई। कई पीड़ितों को कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।
साइबर विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि ऐसे गिरोह सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग कर पीड़ितों में भय और भ्रम पैदा करते हैं। फर्जी अधिकारी बनकर कॉल करना और तत्काल कार्रवाई का डर दिखाना उनकी सबसे बड़ी रणनीति होती है। उन्होंने कहा कि डिजिटल जागरूकता की कमी ऐसे अपराधों को और बढ़ावा देती है।
जांच के दौरान आरोपियों के ठिकानों से लाखों रुपये नकद, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए गए। ये दस्तावेज पूरे नेटवर्क के संचालन और वित्तीय लेनदेन की परतें खोलने में मदद कर रहे हैं।
अधिकारियों के अनुसार यह नेटवर्क केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संचालन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ था, जिसमें कई देशों के लोग भी जुड़े हो सकते हैं। आगे की जांच में और गिरफ्तारियों की संभावना जताई जा रही है।
फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और पूरे साइबर सिंडिकेट की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि इस अंतरराष्ट्रीय ठगी नेटवर्क का पूरी तरह पर्दाफाश किया जा सके।
जांच में यह भी सामने आया है कि यह नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता था, जिसमें अलग-अलग टीमों को कॉलिंग, डेटा स्क्रैपिंग, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे कार्यों के लिए जिम्मेदारी दी गई थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन डाटाबेस से अमेरिकी नागरिकों की जानकारी जुटाकर उन्हें टारगेट किया जाता था।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने भी सतर्कता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि इस तरह के गिरोह वैश्विक स्तर पर डिजिटल ठगी के नए मॉडल अपना रहे हैं, जिसमें एआई आधारित वॉयस क्लोनिंग और फर्जी पहचान तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। किसी भी अनजान कॉल या ईमेल पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसकी सत्यता की जांच करना आवश्यक है। सरकारी एजेंसियां कभी भी इस तरह फोन पर धमकी देकर पैसे की मांग नहीं करतीं।
इस मामले में आगे की जांच में डिजिटल ट्रांजैक्शन ट्रेल, क्रिप्टो वॉलेट्स और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क की भी गहन जांच की जा रही है। एजेंसियों का मानना है कि इस सिंडिकेट ने कई देशों में अपने नेटवर्क फैला रखे थे और इनके पीछे एक बड़ा संगठित साइबर अपराध मॉड्यूल काम कर रहा था। आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां और वित्तीय खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे इस अंतरराष्ट्रीय ठगी रैकेट की पूरी संरचना उजागर हो सकेगी।
