असम में Telegram आधारित साइबर फ्रॉड का नेटवर्क तेजी से विस्तार कर रहा है, जिसमें बेहद छोटे ₹150 के “ऑनलाइन टास्क” से शुरुआत कर लोगों को धीरे-धीरे बड़े निवेश और हाई रिटर्न स्कीम के नाम पर करोड़ों की ठगी में फंसाया जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार यह घटनाएं अलग-अलग नहीं बल्कि एक संगठित डिजिटल इकोसिस्टम का हिस्सा हैं, जो सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए सक्रिय है।
इन स्कैम नेटवर्क्स की कार्यप्रणाली बेहद योजनाबद्ध बताई जा रही है। शुरुआत में पीड़ितों को छोटे-छोटे ऑनलाइन टास्क दिए जाते हैं जैसे वीडियो लाइक करना, रेटिंग देना या किसी प्लेटफॉर्म पर रिव्यू डालना, जिसके बदले ₹100–₹150 तक का भुगतान किया जाता है। शुरुआती भुगतान मिलने के बाद लोगों में भरोसा बनता है और यहीं से असली जाल शुरू होता है।
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इसके बाद यूजर्स को “टास्क इन्वेस्टमेंट प्लान”, “क्रिप्टो रिटर्न”, या “हाई प्रॉफिट ट्रेडिंग” जैसे विकल्पों में जोड़ दिया जाता है। जैसे-जैसे निवेश बढ़ता है, स्कैमर्स “अनलॉक फीस”, “GST चार्ज”, “विथड्रॉल टैक्स” और “प्रोसेसिंग फीस” जैसे बहानों से लगातार अतिरिक्त रकम वसूलते हैं। कई मामलों में पीड़ित अपनी पहले की रकम वापस पाने की उम्मीद में और अधिक पैसा ट्रांसफर कर देते हैं।
जांचकर्ताओं का कहना है कि Telegram की ओपन और अनमैनेज्ड संरचना इन अपराधों को आसान बनाती है। बड़े ग्रुप्स, फर्जी प्रोफाइल, और अस्थायी चैनलों के जरिए ठग तेजी से अपना नेटवर्क बदल लेते हैं, जिससे ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है। कई बार ये नेटवर्क दूसरे राज्यों और देशों तक फैले होते हैं।
एक गंभीर मामले में महिलाओं के KYC दस्तावेज कथित रूप से फर्जी ट्रेनिंग स्कीम के जरिए इकट्ठा किए गए और बाद में इन्हें म्यूल बैंक अकाउंट खोलने में इस्तेमाल किया गया। ऐसे बैंक अकाउंट्स के जरिए ठगी की रकम को अलग-अलग लेयर में घुमाकर निकाल लिया जाता है। इस तरह के मामलों ने बेरोजगार युवाओं और कमजोर वर्गों के अनजाने में इस नेटवर्क का हिस्सा बनने की आशंका बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल पेमेंट और UPI ट्रांजैक्शन के बढ़ते उपयोग के साथ-साथ साइबर जागरूकता की कमी इस तरह के फ्रॉड को और बढ़ावा दे रही है। कई पीड़ित शहरी, शिक्षित और पहली बार निवेश करने वाले युवा होते हैं, जो जल्दी मुनाफे के लालच में फंस जाते हैं।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि “Telegram आधारित फ्रॉड में अपराधी पहले भरोसा बनाते हैं और फिर धीरे-धीरे लोगों को मानसिक रूप से फंसाकर बड़ी रकम ट्रांसफर कराने पर मजबूर कर देते हैं। यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक रणनीति होती है।”
डिजिटल फ्रॉड विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे नेटवर्क अक्सर वर्चुअल नंबर, विदेशी सर्वर और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी पहचान करना बेहद कठिन हो जाता है। साथ ही अपराधी छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक अपने ऑपरेशन का विस्तार कर रहे हैं।
कई मामलों में यह भी देखा गया है कि जब पीड़ित अपनी रकम वापस मांगते हैं, तो उनसे “रिलीज फीस” या “वेरिफिकेशन चार्ज” के नाम पर और पैसा मांगा जाता है, जिससे नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।
अधिकारियों का कहना है कि राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है ताकि इस तरह के साइबर नेटवर्क को समय रहते खत्म किया जा सके। साथ ही बैंकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी म्यूल अकाउंट्स की पहचान के लिए मजबूत निगरानी प्रणाली जरूरी है।
विशेषज्ञों ने नागरिकों को चेतावनी दी है कि किसी भी अनजान Telegram या WhatsApp ग्रुप में शामिल होने से पहले पूरी जांच करें और किसी भी निवेश योजना पर तुरंत भरोसा न करें। संदिग्ध लिंक, टास्क ऑफर या जल्दी पैसे कमाने के दावों से बचना ही सबसे सुरक्षित तरीका है।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस तरह के फ्रॉड और अधिक जटिल और अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते जाएंगे। ऐसे में सतर्कता, जागरूकता और त्वरित शिकायत ही सबसे प्रभावी बचाव है।
