नोएडा पुलिस की जांच में कंबोडिया और म्यांमार बॉर्डर से संचालित साइबर नेटवर्क का खुलासा, जिसमें ई-सिम, म्यूल खाते और APK फाइलों का इस्तेमाल हो रहा था।

डिजिटल अरेस्ट का खौफनाक जाल: तेलंगाना में रिटायर्ड कर्मचारी से ₹1.16 करोड़ की साइबर ठगी

Team The420
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हैदराबाद। तेलंगाना में डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 71 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को कथित जांच और मनी लॉन्ड्रिंग केस के नाम पर डराकर साइबर ठगों ने ₹1.16 करोड़ से अधिक की ठगी कर ली। मामला हैदराबाद के कपरा क्षेत्र का है, जहां पीड़ित को कई महीनों तक वीडियो कॉल पर निगरानी में रखकर मानसिक दबाव बनाया गया और अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई गई।

साइबर अपराधियों ने बेहद सुनियोजित तरीके से खुद को पहले TRAI अधिकारी, फिर मुंबई क्राइम ब्रांच और बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) का अधिकारी बताकर पीड़ित को अपने जाल में फंसाया। पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध अब बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को विशेष रूप से निशाना बना रहे हैं।

जानकारी के अनुसार पीड़ित को 27 जनवरी को एक कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को TRAI अधिकारी बताते हुए दावा किया कि पीड़ित के नाम पर जारी एक मोबाइल नंबर का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों में किया जा रहा है। जब पीड़ित ने ऐसे किसी नंबर से संबंध होने से इनकार किया, तब कथित अधिकारी ने उसे डराते हुए कहा कि मामला गंभीर आपराधिक जांच से जुड़ा हुआ है और तुरंत सहयोग नहीं करने पर गिरफ्तारी हो सकती है।

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इसके बाद पीड़ित को कुछ अन्य लोगों से संपर्क कराया गया, जिन्होंने खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताया। साइबर ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए नकली पूछताछ शुरू की और दावा किया कि पीड़ित का नाम कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से जुड़ा है। इसी दौरान उनसे आधार कार्ड और अन्य निजी दस्तावेजों की जानकारी हासिल कर ली गई।

जांच के नाम पर अपराधियों ने पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रखा। उसे यह चेतावनी दी गई कि वह इस मामले की जानकारी किसी भी परिवार सदस्य, मित्र या बैंक अधिकारी को न दे, क्योंकि मामला “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “गोपनीय जांच” से जुड़ा हुआ है। मानसिक दबाव और कानूनी कार्रवाई के डर के कारण पीड़ित धीरे-धीरे साइबर ठगों के नियंत्रण में आ गया।

बाद में एक अन्य व्यक्ति को वीडियो कॉल पर जोड़ा गया, जिसने खुद को ED अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि वित्त मंत्रालय द्वारा खातों और संपत्तियों का “वेरिफिकेशन” किया जा रहा है और यदि जांच में सहयोग नहीं किया गया तो संपत्ति जब्त हो सकती है। इसी बहाने पीड़ित से उसकी बैंक जमा, निवेश और अन्य संपत्तियों की जानकारी ली गई।

साइबर अपराधियों ने फरवरी से अप्रैल के बीच अलग-अलग चरणों में पीड़ित से कई बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई। 5 मार्च को पीड़ित को यह कहकर ₹60 लाख भेजने के लिए मजबूर किया गया कि यह किसी आधिकारिक ऑपरेशन का हिस्सा है और जांच पूरी होने के बाद राशि वापस कर दी जाएगी। धीरे-धीरे कुल ₹1,16,90,000 की रकम ट्रांसफर कर ली गई, जिसमें ₹76.90 लाख पीड़ित के खाते से और ₹40 लाख उसकी पत्नी के खाते से निकाले गए।

जब लंबे समय तक कोई आधिकारिक पुष्टि या रकम वापसी नहीं हुई, तब पीड़ित को धोखाधड़ी का एहसास हुआ। इसके बाद मामले की शिकायत साइबर क्राइम पुलिस से की गई। शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम थाना मल्काजगिरि ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में अपराधी सामाजिक इंजीनियरिंग और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पूछताछ कर पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती। उन्होंने कहा कि किसी भी संदिग्ध कॉल, गिरफ्तारी की धमकी या गोपनीय जांच के नाम पर मांगी गई बैंकिंग जानकारी को तुरंत नजरअंदाज कर स्थानीय पुलिस और साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करनी चाहिए।

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