₹49 करोड़ निवेश धोखाधड़ी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 53 FIR को एक साथ जोड़ने से इनकार करते हुए पीड़ितों के अधिकारों को अहम बताया।

₹49 करोड़ निवेश घोटाले में सुप्रीम कोर्ट सख्त: 53 FIR एक साथ जोड़ने से इनकार, कहा– पीड़ितों के अधिकार भी अहम

Team The420
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नई दिल्ली। Supreme Court of India ने कथित ₹49 करोड़ निवेश धोखाधड़ी मामले में बड़ा रुख अपनाते हुए सात राज्यों में दर्ज 53 FIR को एक साथ जोड़ने की मांग ठुकरा दी। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि बड़े आर्थिक अपराधों में केवल आरोपी समान होने के आधार पर अलग-अलग FIR को क्लब नहीं किया जा सकता, क्योंकि हर पीड़ित और हर धोखाधड़ी की घटना अलग अपराध मानी जाएगी।

मामले की सुनवाई Chief Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice Vipul M Pancholi की पीठ ने की। अदालत में आरोपियों Upendra Nath Mishra और Kali Prasad Mishra की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Aman Lekhi पेश हुए थे। हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।

मामले से जुड़े आपराधिक केस ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश सहित सात राज्यों में दर्ज हैं। आरोप है कि निवेशकों को ऊंचे रिटर्न का लालच देकर करोड़ों रुपये की ठगी की गई। विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में निवेशकों ने अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई थीं, जिसके बाद कई FIR दर्ज हुईं।

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने दलील दी कि अलग-अलग राज्यों में दर्ज 53 FIR को एक साथ जोड़ देने से जांच और ट्रायल प्रक्रिया तेज होगी तथा एक ही मामले में बार-बार अलग-अलग कानूनी कार्रवाई से बचा जा सकेगा। याचिका में पहले के कुछ सुप्रीम कोर्ट फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें बड़े आर्थिक अपराधों में FIR को क्लब करने की अनुमति दी गई थी।

हालांकि सुप्रीम Court की पीठ ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई। अदालत ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में “speedy trial” और “consolidation of FIR” के नाम पर ऐसे फैसले सामने आए हैं जिनमें आरोपी-केंद्रित दृष्टिकोण अधिक दिखाई देता है, जबकि पीड़ितों के अधिकारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

Chief Justice Surya Kant ने सुनवाई के दौरान कहा कि हाल के आपराधिक कानून संशोधनों में पीड़ितों के अधिकारों को विशेष रूप से मान्यता दी गई है और न्यायिक प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि आर्थिक अपराधों में प्रत्येक निवेशक अलग परिस्थितियों में ठगा जाता है और प्रत्येक मामले में धोखाधड़ी की राशि, घटना और परिस्थितियां अलग होती हैं।

पीठ ने कहा कि भले ही आरोपियों के नाम समान हों, लेकिन हर निवेशक के साथ हुई ठगी स्वतंत्र अपराध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों के लिए FIR को क्लब करना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे अलग-अलग राज्यों के पीड़ितों की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है।

Justice Joymalya Bagchi ने भी सुनवाई के दौरान कहा कि धोखाधड़ी, साजिश और cheating से जुड़े प्रत्येक अपराध का प्रभाव अलग पीड़ित पर पड़ता है, इसलिए इन्हें केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न्याय प्रणाली को “invisible victims” यानी उन पीड़ितों को भी ध्यान में रखना होगा जो लंबे समय तक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बड़े निवेश घोटालों और मल्टी-स्टेट फ्रॉड मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। अब जांच एजेंसियों और अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक पीड़ित की शिकायत को स्वतंत्र रूप से सुना जाए और केवल आरोपियों की सुविधा के आधार पर मामलों को एकीकृत न किया जाए।

साइबर और वित्तीय अपराध मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में निवेश धोखाधड़ी, मल्टी-लेवल मार्केटिंग स्कैम और फर्जी रिटर्न योजनाओं से जुड़े मामलों में तेजी आई है। कई मामलों में आरोपी अलग-अलग राज्यों में हजारों निवेशकों को निशाना बनाते हैं और बाद में कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाने के नाम पर मामलों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को पीड़ित अधिकारों को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण न्यायिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि आर्थिक अपराधों में न्यायिक प्रक्रिया केवल आरोपी की सुविधा के लिए नहीं चल सकती और प्रत्येक पीड़ित को स्वतंत्र कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।

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