नई दिल्ली। देश की न्यायिक व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार विस्तृत नियामक ढांचा प्रस्तावित करते हुए ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं। शीर्ष अदालत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिति ने अदालतों में AI के उपयोग और उसकी सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए 35 पन्नों का मसौदा सार्वजनिक किया है और इस पर हितधारकों तथा आम नागरिकों से 20 जून तक सुझाव मांगे हैं। प्रस्तावित नियमों का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि किसी भी न्यायिक निर्णय, आदेश या निष्कर्ष तक केवल AI या एल्गोरिदम के आधार पर नहीं पहुंचा जा सकेगा।
ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, AI को न्यायिक प्रक्रिया में सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह मानव न्यायाधीशों के पास ही रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक स्वतंत्रता, पारदर्शिता, जवाबदेही और मानव नियंत्रण से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अदालतों में AI की भूमिका केवल सहयोगी होगी, निर्णायक नहीं।
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प्रस्तावित नियम देश के सभी उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ अदालतों, न्यायाधिकरणों और वैधानिक आयोगों पर लागू होंगे, जो किसी प्रकार का न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करते हैं। मसौदे में कहा गया है कि AI का इस्तेमाल न्यायिक प्रणाली को अधिक दक्ष, तेज और तकनीक-सक्षम बनाने के लिए किया जाएगा, लेकिन न्यायिक विवेक और कानूनी व्याख्या पूरी तरह मानवाधारित ही रहेगी।
ड्राफ्ट के अनुसार, अदालतें AI का उपयोग केस मैनेजमेंट, नई याचिकाओं में तकनीकी त्रुटियों की पहचान, कॉज लिस्ट तैयार करने, सुनवाई की तारीख तय करने और लंबित मामलों की प्राथमिकता तय करने जैसे प्रशासनिक कार्यों में कर सकेंगी। इसके अलावा अदालती कार्यवाही का स्वत: ट्रांसक्रिप्शन, कानूनी दस्तावेजों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद, कानूनी शोध, मिसालों की खोज, दस्तावेजों का सारांश तैयार करने और वादकारियों को प्रक्रिया संबंधी जानकारी देने वाले चैटबॉट्स के उपयोग की भी अनुमति दी गई है।
हाल के वर्षों में विभिन्न अदालतों ने AI आधारित उपकरणों के बढ़ते उपयोग को लेकर चिंता जताई थी। कुछ मामलों में ऐसे उदाहरण सामने आए थे, जहां AI टूल्स ने अस्तित्वहीन न्यायिक फैसलों या गलत कानूनी संदर्भों का उल्लेख किया था। इसी पृष्ठभूमि में एक स्पष्ट नियामक ढांचे की आवश्यकता महसूस की गई। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि तकनीक का उपयोग न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना सकता है, लेकिन इसके लिए मजबूत निगरानी और स्पष्ट सीमाएं आवश्यक हैं।
मसौदे में न्यायिक निर्णयों से जुड़े क्षेत्रों में AI के उपयोग पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया गया है। प्रस्तावित नियम 20 के अनुसार, AI का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता का आकलन करने, सजा तय करने, कानूनी निष्कर्ष निकालने या न्यायिक आदेश तैयार करने के लिए नहीं किया जा सकेगा। किसी भी मामले में अंतिम निर्णय, तथ्य निर्धारण और कानून की व्याख्या केवल सक्षम न्यायिक अधिकारी द्वारा ही की जाएगी।
डेटा सुरक्षा को भी मसौदे में प्रमुखता दी गई है। नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत डेटा का उपयोग AI सिस्टम को प्रशिक्षित करने, परीक्षण करने या विकसित करने के लिए संबंधित प्राधिकरण की अनुमति और लागू डेटा संरक्षण कानूनों के अनुपालन के बिना नहीं किया जा सकेगा। इससे संवेदनशील न्यायिक और व्यक्तिगत सूचनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
AI के उपयोग की निगरानी के लिए तीन-स्तरीय संस्थागत ढांचे का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट स्तर पर एक स्थायी शीर्ष नियामक प्राधिकरण बनाया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश करेंगे। इसके अलावा प्रत्येक उच्च न्यायालय में अलग AI समिति गठित की जाएगी, जो स्थानीय स्तर पर नियमों के अनुपालन और क्रियान्वयन की निगरानी करेगी।
मसौदे में ‘सेंटर ऑफ रिसर्च एंड एक्सीलेंस ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ स्थापित करने का भी प्रस्ताव है, जो न्यायपालिका को तकनीकी परामर्श देगा और AI से जुड़े शोध कार्य करेगा। साथ ही सभी AI प्रणालियों का कम से कम वर्ष में एक बार अनिवार्य आंतरिक ऑडिट कराने का प्रावधान रखा गया है। न्यायिक क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल तकनीक और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
