नई दिल्ली। देश में बिना डॉक्टर की सलाह के बेची जा रही यौन शक्तिवर्धक दवाओं पर अब केंद्र सरकार बड़ा शिकंजा कसने की तैयारी में है। ड्रग रेगुलेटर ने ऐसी दवाओं की अवैध बिक्री, वितरण और अनियंत्रित इस्तेमाल को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। बढ़ते दुरुपयोग, नकली दवाओं के प्रसार और युवाओं में इनके तेजी से बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए अब राष्ट्रीय स्तर पर सख्त निगरानी और प्रवर्तन अभियान शुरू किए जाने की तैयारी की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने बिना वैध प्रिस्क्रिप्शन के बेचे जा रहे यौन शक्तिवर्धक उत्पादों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, अनधिकृत मेडिकल स्टोर और अवैध क्लीनिकों के जरिए बड़ी मात्रा में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन और शीघ्रपतन से जुड़ी दवाएं बेचे जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) ने इस मामले को केवल स्वास्थ्य जोखिम तक सीमित नहीं माना है, बल्कि इसे सामाजिक और नियामकीय चुनौती के रूप में भी देखा है। एजेंसी का मानना है कि कम उम्र के युवाओं में इन दवाओं का बढ़ता उपयोग मानसिक दबाव, प्रदर्शन चिंता और सोशल मीडिया आधारित गलत धारणाओं से जुड़ा हुआ है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक सिल्डेनाफिल, तडालाफिल, वॉर्डनफिल और डैपोक्सेटिन जैसी दवाओं का बिना चिकित्सकीय सलाह इस्तेमाल खतरनाक साबित हो सकता है। ये दवाएं शरीर में रक्त प्रवाह को प्रभावित करती हैं और कई बार दूसरी दवाओं के साथ मिलकर गंभीर प्रतिक्रिया पैदा कर सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अनियंत्रित सेवन से अचानक रक्तचाप गिरना, दिल की धड़कन असामान्य होना, चक्कर आना और अन्य गंभीर दुष्प्रभाव सामने आ सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नकली दवाओं को सबसे बड़ा खतरा बताया है। उनका कहना है कि ब्लैक मार्केट और अनधिकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले कई उत्पादों में असुरक्षित रसायन और गलत मात्रा में सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। ऐसे उत्पाद न केवल स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं बल्कि लंबे समय तक शारीरिक जटिलताओं का कारण भी बन सकते हैं।
इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए CDSCO ने राज्यों के ड्रग कंट्रोल विभागों को चार प्रमुख निर्देश जारी किए हैं। इनमें अवैध क्लीनिकों, बिना लाइसेंस चल रही फार्मेसियों और अनियंत्रित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर छापेमारी अभियान चलाना शामिल है। इसके अलावा नए विधायी उपायों पर काम करने, पुलिस और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों को इन दवाओं के जोखिमों के बारे में प्रशिक्षित करने तथा लाइसेंसिंग और प्रिस्क्रिप्शन नियमों की सख्त निगरानी करने पर जोर दिया गया है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया चैनलों पर भी विशेष निगरानी रखी जा सकती है, जहां अक्सर “हर्बल”, “एनर्जी बूस्टर” या “परफॉर्मेंस सपोर्ट” के नाम पर ऐसे उत्पाद खुले तौर पर बेचे जाते हैं। कई मामलों में ग्राहक बिना यह जाने दवाएं खरीद लेते हैं कि उनमें शक्तिशाली रासायनिक तत्व शामिल हैं।
भारत का सेक्सुअल वेलनेस मार्केट तेजी से विस्तार कर रहा है और इसकी अनुमानित कीमत करीब ₹9,500 करोड़ से अधिक आंकी जा रही है। इस क्षेत्र में सन फार्मा, सिप्ला, मैनकाइंड फार्मा, ज़ायडस लाइफसाइंसेज, एली लिली, अल्केम लेबोरेटरीज और डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज जैसी कंपनियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैध दवाओं और नकली उत्पादों के बीच अंतर कर पाना आम उपभोक्ताओं के लिए आसान नहीं होता।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब राज्यसभा सांसद डॉ. अजीत माधवराव गोपछड़े ने इस विषय को उठाते हुए कहा कि प्रदर्शन चिंता और आत्मविश्वास बढ़ाने की चाह में बड़ी संख्या में युवा इन दवाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ब्लैक मार्केट में बिक रही नकली दवाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं।
प्रसिद्ध साइबर और डिजिटल अपराध विशेषज्ञ प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, ऑनलाइन अवैध दवा कारोबार अब संगठित डिजिटल नेटवर्क के जरिए संचालित हो रहा है, जहां सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी वेबसाइट और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर युवाओं को निशाना बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि बिना चिकित्सकीय सलाह किसी भी दवा का उपयोग गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है और लोगों को केवल लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर से ही दवाएं खरीदनी चाहिए।
