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खाते में अचानक आया पैसा बन सकता है जाल: SBI ने ‘जम्प्ड डिपॉजिट स्कैम’ को लेकर जारी की चेतावनी

Team The420
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नई दिल्ली। बैंक खाते में अचानक कुछ रुपये या कुछ सौ रुपये जमा होना सामान्य घटना लग सकती है, लेकिन अब यही एक खतरनाक साइबर ठगी की शुरुआत भी हो सकती है। देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने ग्राहकों को एक नए प्रकार की डिजिटल धोखाधड़ी से सावधान किया है, जिसे “जम्प्ड डिपॉजिट स्कैम” कहा जा रहा है। इस ठगी में साइबर अपराधी पहले जानबूझकर पीड़ित के खाते में छोटी राशि भेजते हैं और फिर उसे वापस करने के बहाने बड़ी रकम निकलवा लेते हैं।

SBI के अनुसार यह धोखाधड़ी किसी तकनीकी खामी या हैकिंग पर आधारित नहीं है। इसके बजाय अपराधी लोगों के विश्वास, भावनाओं और मानवीय व्यवहार का फायदा उठाते हैं। डिजिटल भुगतान के तेजी से बढ़ते उपयोग के बीच साइबर ठग सोशल इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर लोगों को जाल में फंसा रहे हैं।

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इस स्कैम की शुरुआत आमतौर पर एक छोटी राशि से होती है। ठग किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कुछ रुपये या कुछ सौ रुपये ट्रांसफर कर देते हैं। इसके बाद पीड़ित को फोन कॉल या संदेश भेजकर बताया जाता है कि रकम गलती से उसके खाते में चली गई है और उसे तुरंत वापस करने का अनुरोध किया जाता है। कई बार अपराधी खुद को परेशान, चिंतित या किसी आपात स्थिति में फंसा हुआ बताकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करते हैं।

हालांकि, ठग सीधे पैसे वापस भेजने के लिए नहीं कहते। इसके बजाय वे पीड़ित को एक UPI “कलेक्ट रिक्वेस्ट” या भुगतान स्वीकृति अनुरोध भेजते हैं। पीड़ित यह सोचकर कि वह केवल गलती से आई रकम लौटा रहा है, बिना पूरी जानकारी जांचे अनुरोध को मंजूर कर देता है। यहीं पर असली धोखाधड़ी होती है। कई मामलों में स्वीकृत राशि मूल जमा रकम से कहीं अधिक होती है। जैसे ही पीड़ित अपना UPI PIN दर्ज करता है, उसके खाते से बड़ी रकम निकल जाती है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह ठगी इसलिए प्रभावी साबित होती है क्योंकि अधिकांश लोग किसी की गलती सुधारने में मदद करना अपना नैतिक दायित्व समझते हैं। साइबर अपराधी इसी मानवीय प्रवृत्ति का फायदा उठाते हैं और जल्दबाजी का माहौल बनाकर लोगों को बिना सत्यापन के निर्णय लेने पर मजबूर कर देते हैं।

पारंपरिक फिशिंग हमलों के विपरीत, इस तरह की धोखाधड़ी में अपराधी पासवर्ड, OTP या बैंकिंग क्रेडेंशियल्स नहीं मांगते। इसके बजाय वे पीड़ित से ही लेनदेन को अधिकृत करवा लेते हैं। यही कारण है कि कई लोगों को तब तक ठगी का एहसास नहीं होता जब तक उनके खाते से पैसा निकल नहीं जाता।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, आज के साइबर अपराधी तकनीकी कमजोरियों से अधिक मानवीय कमजोरियों को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि सोशल इंजीनियरिंग आधारित ठगी में अपराधी पहले विश्वास कायम करते हैं और फिर भावनात्मक दबाव बनाकर पीड़ित से जल्दबाजी में निर्णय करवाते हैं। प्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि खाते में अचानक आई किसी भी राशि, रिफंड अनुरोध या UPI भुगतान स्वीकृति संदेश की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किए बिना कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। उनके अनुसार, “साइबर अपराधी जानते हैं कि डिजिटल सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी अक्सर इंसानी भरोसा होता है। केवल किसी के गलती से पैसा भेजने का दावा करने पर UPI रिक्वेस्ट को मंजूर नहीं करना चाहिए।”

SBI ने ग्राहकों को सलाह दी है कि यदि उनके खाते में कोई अज्ञात राशि जमा होती है तो वे घबराएं नहीं और न ही किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत में उलझें। सबसे पहले बैंकिंग ऐप या खाते के विवरण में लेनदेन की पुष्टि करें। यदि राशि के स्रोत को लेकर संदेह हो तो सीधे बैंक से संपर्क करें।

बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि UPI PIN केवल तब दर्ज किया जाता है जब खाते से पैसा बाहर जा रहा हो। यदि किसी लेनदेन के दौरान PIN दर्ज करने के लिए कहा जा रहा है, तो उपयोगकर्ताओं को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे वास्तव में पैसा प्राप्त कर रहे हैं या भेज रहे हैं। छोटी सी लापरवाही बड़े वित्तीय नुकसान में बदल सकती है।

SBI ने ग्राहकों को केवल “1600” से शुरू होने वाले अधिकृत बैंकिंग कॉल्स पर भरोसा करने की सलाह दी है। यदि किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी का संदेह हो या वह पहले ही ऐसे किसी लेनदेन का शिकार हो चुका हो, तो उसे तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर रिपोर्ट करनी चाहिए और संबंधित बैंक को तत्काल सूचित करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर शिकायत करने से धनराशि को ट्रैक करने और नुकसान कम करने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

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