पंजाब प्रशासनिक सेवा की अधिकारी और गुरदासपुर की तत्कालीन एसडीएम अनुप्रीत कौर की गिरफ्तारी ने राज्य के प्रशासनिक हलकों में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। छह वर्ष पुराने भूमि अधिग्रहण मुआवजा घोटाले से जुड़े आरोपों, लगातार जांच और बढ़ते विवादों के बाद आखिरकार 16 मई की सुबह उनकी गिरफ्तारी हुई। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई जब उनके खिलाफ चल रही जांच लंबे समय से सुर्खियों में बनी हुई थी।
जानकारी के अनुसार, 16 मई की सुबह लगभग सात बजे एक पुलिस टीम गुरदासपुर के जेल रोड स्थित सरकारी आवास पर पहुंची और अनुप्रीत कौर को हिरासत में ले लिया। कार्रवाई बेहद गोपनीय तरीके से की गई और स्थानीय मीडिया को इसकी जानकारी तब मिली जब उन्हें अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर भेजा जा चुका था।
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हालांकि गिरफ्तारी अचानक हुई प्रतीत हुई, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इसे अप्रत्याशित नहीं माना गया। वर्ष 2012 बैच की पंजाब सिविल सेवा अधिकारी अनुप्रीत कौर पिछले कई वर्षों से भूमि अधिग्रहण से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में जांच का सामना कर रही थीं। उन पर आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान सार्वजनिक धन के वितरण में गंभीर अनियमितताएं कीं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, मामला उस समय का है जब अनुप्रीत कौर तरनतारन जिले के पट्टी क्षेत्र में तैनात थीं। आरोप है कि भूमि अधिग्रहण मुआवजे के भुगतान के दौरान दस्तावेजों में हेरफेर, फर्जी रिकॉर्ड और अन्य प्रक्रियागत अनियमितताओं के जरिए करीब ₹1.63 करोड़ की सरकारी राशि का गबन किया गया। मामले में गबन, धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित आरोप लगाए गए हैं।
अनुप्रीत कौर का प्रशासनिक करियर कभी राज्य की युवा और प्रतिभाशाली अधिकारियों में गिना जाता था। अमृतसर में पली-बढ़ीं अनुप्रीत ने पहले एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद सिविल सेवा की ओर रुख किया। वर्ष 2012 में पंजाब सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया। एक चिकित्सक से प्रशासक बनने की उनकी यात्रा को लंबे समय तक प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा।
प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्होंने विभिन्न जिलों में जिम्मेदार पदों पर कार्य किया। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम कई विवादों और राजनीतिक बहसों का हिस्सा बनता रहा। भूमि अधिग्रहण मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ-साथ उनके खिलाफ आरोपों की गंभीरता भी बढ़ती गई।
सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियों ने वित्तीय रिकॉर्ड, भूमि अधिग्रहण दस्तावेजों और बैंकिंग लेनदेन की विस्तृत जांच के बाद कार्रवाई को अंतिम रूप दिया। अधिकारियों का मानना है कि मामले में कई स्तरों पर कथित अनियमितताएं हुईं, जिनकी भूमिका और जिम्मेदारी तय करने के लिए लंबे समय तक साक्ष्य एकत्र किए गए।
गिरफ्तारी के बाद अदालत ने उन्हें पुलिस हिरासत में भेजा, जहां जांच एजेंसियां कथित धन प्रवाह, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और अन्य संभावित आरोपियों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं। मामले में आगे और गिरफ्तारियों या अतिरिक्त खुलासों की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
राज्य में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही, भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण में बड़े पैमाने पर मुआवजा राशि वितरित की जाती है, ऐसे में किसी भी प्रकार की अनियमितता सीधे सरकारी वित्तीय व्यवस्था पर प्रभाव डालती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में इस मामले की सुनवाई और जांच की दिशा काफी महत्वपूर्ण होगी। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह पंजाब के प्रशासनिक इतिहास के चर्चित वित्तीय अनियमितता मामलों में शामिल हो सकता है। वहीं अनुप्रीत कौर को अदालत में अपना पक्ष रखने और आरोपों का कानूनी जवाब देने का अवसर मिलेगा।
फिलहाल, एक समय राज्य की उभरती हुई महिला प्रशासनिक अधिकारियों में गिनी जाने वाली अनुप्रीत कौर की गिरफ्तारी ने उनके करियर की दिशा पूरी तरह बदल दी है। छह वर्ष पुराने मामले में हुई यह कार्रवाई अब पंजाब के प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रह सकती है।
