चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जीएसटी से जुड़े लगभग ₹35 करोड़ के कथित फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले में आरोपी व्यवसायी कुलदीप गोयल को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला केवल दस्तावेजी गड़बड़ी का नहीं बल्कि गंभीर आर्थिक अपराध से जुड़ा है, जिसमें संगठित तरीके से फर्जी इनवॉइस और नकली कंपनियों के जरिए सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं।
यह मामला M/s Ansh Steel Alloys नामक फर्म से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि उसने वर्ष 2019-20, 2020-21 और 2021-22 के दौरान बिना वास्तविक माल या सेवा आपूर्ति के फर्जी बिलों के आधार पर करीब ₹35 करोड़ का इनपुट टैक्स क्रेडिट गलत तरीके से प्राप्त किया। जांच एजेंसियों के अनुसार यह पूरा नेटवर्क ऐसे डीलिंग्स पर आधारित था जिनमें कई फर्में बाद में रद्द या फर्जी पाई गईं।
राजस्व विभाग की जांच में यह भी सामने आया कि फर्म ने संदिग्ध कंपनियों से इनवॉइस प्राप्त किए, जबकि वास्तविक आपूर्ति का कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं था। इसके आधार पर भारी मात्रा में ITC क्लेम किया गया और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया गया। अधिकारियों ने यह भी बताया कि कई मामलों में एक ही तरह के पैटर्न पर लेनदेन दिखाए गए, जिससे पूरे नेटवर्क के संगठित होने का संदेह और मजबूत हुआ।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने छापेमारी की कार्रवाई भी की थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए। जांच के दौरान यह संकेत भी मिले कि फर्जी लेनदेन को छिपाने के लिए डिजिटल माध्यमों और फर्जी कंपनियों की श्रृंखला का इस्तेमाल किया गया।
याचिकाकर्ता कुलदीप गोयल ने अदालत में दलील दी कि उनके खिलाफ आरोप केवल दस्तावेजी प्रकृति के हैं और किसी प्रकार की गिरफ्तारी या कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना था कि अधिकतर रिकॉर्ड पहले ही विभाग के पास उपलब्ध हैं और जांच में सहयोग किया जा रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि समान मामलों में पहले से कार्यवाही चल रही है, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए।
हालांकि सरकारी पक्ष ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। विभाग ने अदालत को बताया कि आरोपी जांच से लगातार बच रहा है और कई बार समन जारी किए जाने के बावजूद वह पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं हुआ। अधिकारियों ने यह भी कहा कि फर्जी इनवॉइस और शेल कंपनियों के जरिए पूरा नेटवर्क चलाया जा रहा था, जिसकी परतें खोलने के लिए कस्टोडियल पूछताछ जरूरी है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक अपराध केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये पूरे वित्तीय तंत्र को प्रभावित करते हैं। अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में जांच शुरुआती चरण में है और आरोपी की भूमिका की गहराई से जांच आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि GST अधिनियम की धारा 69 और 70 के तहत अधिकारियों को जांच और गिरफ्तारी के पर्याप्त अधिकार प्राप्त हैं, और जब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के संकेत हों तो अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।
अंततः हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और जांच को निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ाने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देशभर में फर्जी ITC और शेल कंपनियों के जरिए टैक्स चोरी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय जीएसटी प्रणाली में अनुशासन और पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है।
