मुंबई। नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (NSEL) घोटाले से जुड़ी संपत्तियों की नीलामी को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कथित तौर पर कम मूल्यांकन और संदिग्ध प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यह मामला “स्कैम के भीतर स्कैम” जैसा प्रतीत होता है, जहां निवेशकों की रकम की रिकवरी के नाम पर संपत्तियों को वास्तविक बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर बेचने की कोशिश की जा रही थी।
हाईकोर्ट ने संबंधित नीलामी प्रक्रिया को रद्द करते हुए कहा कि किसी भी एसेट रिकवरी प्रक्रिया का उद्देश्य अधिकतम और निष्पक्ष मूल्य प्राप्त करना होना चाहिए, ताकि प्रभावित निवेशकों और लेनदारों को उचित राहत मिल सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्तियों को जानबूझकर कम कीमत पर बेचा जाता है, तो इससे न केवल निवेशकों को भारी आर्थिक नुकसान होगा बल्कि पूरी न्यायिक और वित्तीय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी गंभीर असर पड़ेगा।
यह मामला NSEL घोटाले से जुड़ी उन संपत्तियों का है जिन्हें कथित वित्तीय अनियमितताओं के बाद निवेशकों की रकम वापस दिलाने के लिए नीलाम किया जाना था। हालांकि अदालत के सामने दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि संपत्तियों का मूल्यांकन पारदर्शी तरीके से नहीं किया गया और उन्हें बाजार मूल्य से काफी कम दर पर बेचने की तैयारी की जा रही थी।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड, मूल्यांकन रिपोर्ट और नीलामी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा की। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि संपत्तियों का वास्तविक बाजार मूल्य सामने लाने की पर्याप्त कोशिश नहीं की गई। अदालत ने यह भी कहा कि यदि सार्वजनिक हित और निवेशकों के पैसे से जुड़े मामलों में इस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकवरी प्रक्रिया को किसी नए वित्तीय फर्जीवाड़े या अपारदर्शी लेनदेन का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि भविष्य में किसी भी नीलामी या संपत्ति बिक्री की प्रक्रिया स्वतंत्र मूल्यांकन, पारदर्शिता और स्थापित कानूनी मानकों के अनुरूप ही की जाए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आर्थिक अपराधों और बड़े वित्तीय घोटालों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। उनका मानना है कि अदालत ने साफ संकेत दिया है कि निवेशकों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की संदिग्ध प्रक्रिया को न्यायिक संरक्षण नहीं मिलेगा।
वित्तीय अपराध मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि बड़े घोटालों में केवल मूल धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि बाद की रिकवरी और एसेट डिस्पोजल प्रक्रिया में भी हेरफेर की आशंका बनी रहती है। इसी कारण अदालतें अब संपत्ति नीलामी और रिकवरी तंत्र की अधिक गहराई से निगरानी कर रही हैं।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि बड़े आर्थिक घोटालों में रिकवरी प्रक्रिया की पारदर्शिता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी मूल जांच। उन्होंने कहा, “यदि निवेशकों की संपत्तियों की रिकवरी में ही अनियमितता या अंडरवैल्यूएशन की आशंका पैदा हो जाए तो इससे पूरे वित्तीय सिस्टम पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। ऐसे मामलों में स्वतंत्र ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड ट्रैकिंग और निष्पक्ष मूल्यांकन बेहद जरूरी हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक अपराधों में अक्सर जटिल वित्तीय नेटवर्क और कई परतों वाले लेनदेन शामिल होते हैं, जिसके कारण एसेट रिकवरी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखना आवश्यक हो जाता है।
फिलहाल अदालत के फैसले के बाद संबंधित संपत्तियों की नीलामी प्रक्रिया पर रोक लग गई है और अब नए सिरे से मूल्यांकन तथा कानूनी समीक्षा की संभावना बढ़ गई है। मामले पर निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और कानूनी विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है, क्योंकि इसे देश के सबसे चर्चित वित्तीय विवादों में से एक माना जा रहा है।
