नोएडा। देश में तेजी से फैल रहे अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क का एक और बड़ा खुलासा नोएडा में हुआ है। साइबर क्राइम थाना पुलिस ने ऐसे गिरोह की परतें खोली हैं, जिसका संचालन कथित तौर पर कंबोडिया और म्यांमार बॉर्डर से किया जा रहा था। जांच में सामने आया है कि साइबर ठग भारत से म्यूल बैंक खाते, ई-सिम और डिजिटल एक्सेस हासिल कर उन्हें विदेश बैठकर ऑपरेट कर रहे थे। इन नेटवर्क्स के जरिए डिजिटल अरेस्ट, निवेश ठगी और फर्जी ऑनलाइन ट्रांजैक्शन जैसे अपराधों को अंजाम दिया जा रहा था।
मामले का खुलासा उस समय हुआ जब नोएडा पुलिस ने गुरुग्राम क्षेत्र से एक कथित एजेंट को गिरफ्तार किया। आरोप है कि वह विदेशी साइबर गिरोहों को अवैध तरीके से ई-सिम उपलब्ध कराता था। जांच एजेंसियों के मुताबिक, आरोपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए साइबर ठगों के संपर्क में आया था और पैसों के लालच में बड़ी संख्या में सिम एक्टिवेट कर विदेशी नेटवर्क तक पहुंचा रहा था। पूछताछ में यह भी सामने आया कि उसने 150 से अधिक ई-सिम एक्टिवेट कर गिरोह तक पहुंचाए थे, जिनका इस्तेमाल कई साइबर अपराधों में हुआ।
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जांच अधिकारियों के अनुसार, साइबर गिरोह ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जो कम पढ़े-लिखे हों, आर्थिक रूप से कमजोर हों या जल्दी पैसे कमाने की तलाश में हों। कई मामलों में मजदूर वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर अतिरिक्त सिम जारी कराए जाते थे। आरोपियों द्वारा ग्राहक की पहचान, आधार आधारित सत्यापन और फिंगरप्रिंट का दुरुपयोग कर दूसरा सिम निकाला जाता था, जिसे बाद में ई-सिम में बदलकर विदेशों में बैठे साइबर अपराधियों तक पहुंचा दिया जाता था।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि साइबर ठग केवल सिम कार्ड तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे भारतीय बैंक खातों को भी नियंत्रित कर रहे थे। इसके लिए APK आधारित रिमोट एक्सेस एप्लीकेशन का इस्तेमाल किया जा रहा था। जांच एजेंसियों का कहना है कि अपराधी फर्जी ऐप लिंक भेजकर मोबाइल डिवाइस तक पहुंच बना लेते थे और फिर बैंक खातों का संचालन विदेश से करते थे। इसी माध्यम से साइबर ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर खपाया जाता था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि सोशल मीडिया के जरिए पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को विदेश में नौकरी दिलाने का लालच दिया जा रहा था। कई युवाओं को कथित तौर पर कंबोडिया और म्यांमार सीमा क्षेत्रों में भेजा गया, जहां उनसे साइबर फ्रॉड कॉल सेंटरों में काम कराया गया। वहीं जो लोग विदेश नहीं जाना चाहते थे, उन्हें कमीशन के बदले बैंक खाते, सिम कार्ड और डिजिटल पहचान उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह अब पारंपरिक ऑनलाइन ठगी से आगे बढ़कर संगठित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर चुके हैं। उनका कहना है कि “ई-सिम, म्यूल बैंक खाते, रिमोट एक्सेस एप और सोशल इंजीनियरिंग के जरिए अपराधी भारत में बैठकर नहीं, बल्कि विदेश से पूरे नेटवर्क को नियंत्रित कर रहे हैं। कई मामलों में पीड़ित को पता तक नहीं चलता कि उसके दस्तावेज, बैंक खाता या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल साइबर अपराध में हो रहा है।”
उन्होंने लोगों को सलाह दी कि किसी भी अनजान लिंक, APK फाइल या मोबाइल ऐप को डाउनलोड करने से बचें। इसके अलावा सिम जारी कराते समय दस्तावेजों और बायोमेट्रिक सत्यापन प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अचानक बैंक खाते में संदिग्ध ट्रांजैक्शन, अनजान OTP या मोबाइल नेटवर्क संबंधी गतिविधि दिखाई दे, तो तुरंत संबंधित बैंक और साइबर हेल्पलाइन को सूचना देनी चाहिए।
फिलहाल नोएडा साइबर पुलिस विदेशी नेटवर्क से जुड़े अन्य एजेंटों, बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि यह केवल एक स्थानीय मामला नहीं, बल्कि भारत के कई राज्यों में फैले बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का हिस्सा हो सकता है।
