नासिक। महाराष्ट्र के नासिक में सरकारी डिजिटल हस्ताक्षरों के कथित दुरुपयोग से जुड़ा एक गंभीर साइबर और आर्थिक फर्जीवाड़ा सामने आया है। मामले में एक युवक को गिरफ्तार कर न्यायिक प्रक्रिया के बाद केंद्रीय कारागार भेज दिया गया है। आरोप है कि उसने विभागीय राजस्व आयुक्त के फर्जी डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल कर सरकारी रिकॉर्ड और वित्तीय प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश की। इस घटना ने सरकारी डिजिटल सुरक्षा और ई-प्रमाणीकरण व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी की पहचान 23 वर्षीय अभिषेक संजय झरे के रूप में हुई है, जो नवी मुंबई के ऐरोली क्षेत्र का निवासी बताया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि आरोपी ने कथित रूप से नकली डिजिटल हस्ताक्षर तैयार कर सरकारी दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करने की कोशिश की। शुरुआती जांच में आर्थिक अनियमितताओं और सरकारी तंत्र को गुमराह करने के संकेत मिले हैं।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए नासिकरोड पुलिस ने तकनीकी और डिजिटल जांच शुरू की। अधिकारियों के मुताबिक आरोपी तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया गतिविधियों, डिजिटल ट्रैकिंग और तकनीकी विश्लेषण का सहारा लिया गया। जांच के दौरान पुलिस को आरोपी के संभावित ठिकाने के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद विशेष टीम को नवी मुंबई भेजा गया।
सूत्रों के अनुसार जांच में सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुलिस को फेसबुक पर आरोपी की एक स्थानीय जनप्रतिनिधि के साथ तस्वीर मिली, जिसके आधार पर आगे की कड़ियां जोड़ी गईं। पूछताछ में यह सामने आया कि आरोपी कुछ योजनाओं और प्रशासनिक मामलों के सिलसिले में संपर्क में था। इसके बाद पुलिस ने रणनीति बनाकर आरोपी को मुलाकात के बहाने बुलाया और तय स्थान पर पहुंचते ही हिरासत में ले लिया।
गिरफ्तारी के बाद आरोपी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे पुलिस हिरासत में भेजा गया था। पूछताछ और प्रारंभिक जांच पूरी होने के बाद अब उसे केंद्रीय कारागार भेज दिया गया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आरोपी अकेले काम कर रहा था या उसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय था।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सिग्नेचर आज सरकारी और कॉरपोरेट प्रशासन का बेहद संवेदनशील हिस्सा बन चुके हैं। इनका उपयोग वित्तीय स्वीकृतियों, प्रशासनिक आदेशों, ई-टेंडर, सरकारी फाइलिंग और संवेदनशील दस्तावेजों के प्रमाणीकरण में किया जाता है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी के डिजिटल हस्ताक्षर का दुरुपयोग होता है, तो उससे बड़े पैमाने पर आर्थिक और प्रशासनिक नुकसान हो सकता है।
जांच अधिकारियों के अनुसार आरोपी के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, ईमेल गतिविधियों, डिजिटल प्रमाणपत्रों और ऑनलाइन संचार का फोरेंसिक परीक्षण किया जा रहा है। साइबर विशेषज्ञ यह भी जांच कर रहे हैं कि डिजिटल सिग्नेचर बनाने या क्लोन करने के लिए किस तकनीक का उपयोग किया गया। साथ ही यह पता लगाया जा रहा है कि कहीं किसी सरकारी सिस्टम या डेटा तक अवैध पहुंच तो नहीं बनाई गई थी।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर सोशल इंजीनियरिंग, डेटा चोरी और कमजोर डिजिटल सुरक्षा प्रोटोकॉल का इस्तेमाल किया जाता है। यदि किसी अधिकारी की पहचान संबंधी जानकारी, डिजिटल सर्टिफिकेट या एक्सेस क्रेडेंशियल्स गलत हाथों में पहुंच जाएं, तो उनका उपयोग फर्जी दस्तावेज तैयार करने में किया जा सकता है।
इस घटना ने सरकारी विभागों में उपयोग हो रहे डिजिटल प्रमाणीकरण सिस्टम की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पासवर्ड आधारित सुरक्षा अब पर्याप्त नहीं रह गई है। मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, हार्डवेयर सिक्योरिटी टोकन और रियल-टाइम वेरिफिकेशन जैसी तकनीकों को व्यापक स्तर पर लागू करना जरूरी हो गया है।
जांच एजेंसियां अब आरोपी के संभावित आर्थिक लेनदेन, संपर्कों और डिजिटल गतिविधियों का विस्तृत विश्लेषण कर रही हैं। अधिकारियों को उम्मीद है कि आगे की जांच में इस कथित फर्जीवाड़े से जुड़े अन्य लोगों और संभावित लाभार्थियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि डिजिटल प्रशासन के बढ़ते दौर में साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह सरकारी विश्वसनीयता, वित्तीय सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुकी है।
