चंपाई। म्यांमार से भारत में अवैध रूप से लाई जा रही सूखी सुपारी के कारोबार से जुड़े कथित ₹300 करोड़ के फर्जी ई-वे बिल और मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मिजोरम के चंपाई क्षेत्र में नौ ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया है। जांच एजेंसी को संदेह है कि सीमा पार से लाई गई सुपारी को वैध व्यापार का रूप देने के लिए फर्जी दस्तावेजों, जाली ई-वे बिलों और स्थानीय सहयोगियों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए सैकड़ों करोड़ रुपये के अवैध वित्तीय लेनदेन को अंजाम दिया गया।
मामला उस कथित नेटवर्क से जुड़ा है, जो म्यांमार से आने वाली सूखी सुपारी को बिना वैध सीमा शुल्क प्रक्रिया के भारत में प्रवेश दिलाकर विभिन्न राज्यों तक पहुंचाता था। जांच में सामने आया है कि इस पूरे कारोबार को वैध दिखाने के लिए बड़े पैमाने पर फर्जी ई-वे बिल तैयार किए गए और स्थानीय व्यापारियों के नाम का उपयोग किया गया। अधिकारियों को आशंका है कि अवैध कारोबार से अर्जित धन को विभिन्न माध्यमों से वैध दिखाने का प्रयास भी किया गया।
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सूत्रों के अनुसार, मनी लॉन्ड्रिंग की यह जांच वर्ष 2024 में दर्ज एक आपराधिक मामले के आधार पर शुरू हुई थी। शुरुआती जांच में कथित तौर पर यह खुलासा हुआ कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच सूखी सुपारी के परिवहन और व्यापार को वैध दर्शाने के लिए बड़ी संख्या में ई-वे बिल जारी किए गए। इनमें से कई लेनदेन ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओं के नाम पर दिखाए गए, जिनका वास्तविक व्यापारिक गतिविधियों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं पाया गया।
जांच एजेंसियों के अनुसार, फर्जी ई-वे बिलों का उपयोग कर तस्करी से लाई गई सुपारी को स्थानीय कृषि उत्पाद या वैध खरीद के रूप में दर्शाया जाता था। इसके बाद माल को राज्य से बाहर भेजा जाता था। कई मामलों में जिन लोगों के नाम पर व्यापार दिखाया गया, उनके पंजीकरण और कारोबारी दस्तावेजों को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि म्यांमार सीमा से सटे क्षेत्रों का इस्तेमाल कथित रूप से अवैध प्रवेश मार्ग के रूप में किया जाता था। सीमा पार से आने वाली खेपों को पहले स्थानीय गोदामों में रखा जाता और फिर उन्हें विभिन्न राज्यों के बाजारों तक पहुंचाया जाता था। इस प्रक्रिया में कई स्तरों पर सहयोगियों की भूमिका होने की आशंका जताई जा रही है।
वित्तीय जांच में बैंक खातों और धन हस्तांतरण के पैटर्न की भी पड़ताल की जा रही है। अधिकारियों को संदेह है कि नेटवर्क से जुड़े लोगों के खातों में बड़ी रकम भेजी गई, जिसके बदले कथित तौर पर कमीशन का भुगतान किया जाता था। जांच एजेंसियां अब धन के स्रोत, लाभार्थियों और अंतिम उपयोगकर्ताओं की पहचान करने में जुटी हैं।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू तथाकथित “फ्रंट क्लेमेंट” व्यवस्था भी है। जांच में आरोप है कि जब किसी खेप को जांच एजेंसियों द्वारा जब्त किया जाता था, तब कुछ व्यक्तियों को आगे कर माल पर स्वामित्व का दावा कराया जाता था। इसके लिए पुराने दस्तावेजों, बिल ऑफ एंट्री और कथित रूप से फर्जी इनवॉइस का उपयोग किया जाता था। अधिकारियों को संदेह है कि जब्त माल को छुड़ाने और संबंधित प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के लिए भी बड़ी रकम खर्च की जाती थी।
तलाशी अभियान के दौरान जिन परिसरों को जांच के दायरे में लिया गया, उनमें स्थानीय व्यापारिक प्रतिष्ठानों के संचालकों और उनसे जुड़े व्यक्तियों के आवास व अन्य परिसर शामिल हैं। जांच एजेंसी को उम्मीद है कि तलाशी से प्राप्त दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय जानकारी पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में मदद करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल तस्करी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फर्जी दस्तावेजों, कर चोरी, वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आर्थिक अपराधों से भी जुड़ सकता है। फिलहाल जांच जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य व्यक्तियों तथा संस्थाओं की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।
