मुंबई। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में Barracks Retail India Pvt. Ltd. के पूर्व निदेशक को ₹50.36 लाख और 12% वार्षिक ब्याज सहित राशि वापस जमा करने का आदेश दिया है। यह कार्रवाई कॉर्पोरेट दिवालियापन प्रक्रिया (CIRP) के दौरान कथित रूप से किराये की आय के गबन और फर्जी दस्तावेज़ों के इस्तेमाल के आरोपों के बाद की गई है।
इस मामले की शुरुआत Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के तहत चल रही दिवालियापन प्रक्रिया के दौरान हुई थी, जब Resolution Professional ने कंपनी के प्रबंधन पर संपत्तियों को छिपाने और अवैध वित्तीय लेन-देन के गंभीर आरोप लगाए। बाद में वित्तीय लेनदार ASREC (India) Ltd. ने भी इस मामले को आगे बढ़ाया।
ट्रिब्यूनल के अनुसार, पूर्व निदेशक पुणीत पी. भाटिया पर आरोप है कि उन्होंने Bhiwandi स्थित कंपनी की संपत्तियों को व्यक्तिगत स्तर पर lease and licence समझौतों के तहत अलग-अलग पक्षों को किराये पर दिया। ये समझौते CIRP शुरू होने से ठीक पहले किए गए, जिससे लेन-देन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
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जांच में यह सामने आया कि इन संपत्तियों से प्राप्त किराये की आय कंपनी के खाते में जमा नहीं की गई, बल्कि उसे पूर्व निदेशक से जुड़े खातों में ट्रांसफर किया गया। ट्रिब्यूनल ने इसे जानबूझकर वित्तीय जानकारी छिपाने और संपत्ति के दुरुपयोग का मामला माना।
आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि एक ही संपत्ति के अलग-अलग हिस्सों को कई किरायेदारों को दिया गया, जबकि Resolution Professional को यह गलत जानकारी दी गई कि पूरी संपत्ति एक ही इकाई को दी गई है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इस तरह के कदमों से पूरी दिवालियापन प्रक्रिया प्रभावित हुई और हितधारकों को गुमराह किया गया।
रिकॉर्ड के अनुसार, किरायेदारों द्वारा लगभग ₹9.67 लाख और ₹40.68 लाख का भुगतान किया गया, जिसे कंपनी के बजाय पूर्व निदेशक से जुड़े खातों में ट्रांसफर किया गया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह राशि कानूनी रूप से कंपनी की थी और इसका गलत तरीके से उपयोग किया गया।
NCLT ने इसे Insolvency and Bankruptcy Code की धारा 66 के तहत “fraudulent trading” का मामला माना और कहा कि यह धारा 14 के तहत लागू moratorium नियमों का भी उल्लंघन है। ट्रिब्यूनल ने टिप्पणी की कि प्रबंधन ने न केवल जानकारी छिपाई बल्कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का पालन भी नहीं किया।
अदालत ने आदेश दिया कि पूरी राशि 30 दिनों के भीतर जमा की जाए और उस पर 12% वार्षिक ब्याज भी लागू होगा, जिससे कुल देनदारी और बढ़ जाएगी। यह कदम कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मामलों में सख्त रुख को दर्शाता है।
इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने मामला Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) को भेज दिया है, ताकि Section 70, 72, 73 और 74 के तहत आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके। इन धाराओं के तहत दिवालियापन प्रक्रिया में कदाचार पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।
NCLT ने यह भी कहा कि पूर्व निदेशक के कार्यों ने Resolution Professional के काम में बाधा डाली और कंपनी की संपत्तियों के उचित मूल्यांकन और समाधान प्रक्रिया को प्रभावित किया। इससे लेनदारों के हितों को सीधा नुकसान पहुंचा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दिवालियापन मामलों में बढ़ती सख्ती को दर्शाता है, खासकर उन मामलों में जहां प्रबंधन पर संपत्तियों के दुरुपयोग और निजी लाभ के लिए फंड डायवर्जन के आरोप होते हैं।
यह मामला उन बढ़ती प्रवृत्तियों में शामिल है, जहां दिवालियापन प्रक्रिया के दौरान कंपनियों की संपत्तियों के दुरुपयोग के मामलों पर ट्रिब्यूनल और नियामक संस्थाएं तेजी से कार्रवाई कर रही हैं।
फिलहाल, IBBI की रिपोर्ट और आगे की जांच के आधार पर इस मामले में और भी सख्त कदम उठाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
