देशभर में एलपीजी बुकिंग से जुड़े साइबर फ्रॉड में तेजी से बढ़ोतरी के बीच साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने 5,000 से अधिक फर्जी अकाउंट्स और संदिग्ध डिजिटल एसेट्स की पहचान की है। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब मुंबई में कई मामलों में साइबर अपराधियों द्वारा 100 से अधिक उपभोक्ताओं से करीब ₹2.7 करोड़ की ठगी की गई, जिसमें फर्जी बुकिंग लिंक, इम्पर्सोनेशन और मालिशियस मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया गया।
पारंपरिक वित्तीय ठगी के मुकाबले एलपीजी बुकिंग फ्रॉड पूरी तरह अलग मॉडल पर काम करता है। इसमें निवेश या भारी रिटर्न के झांसे के बजाय रोजमर्रा की जरूरतों और आवश्यक सेवाओं पर निर्भरता का फायदा उठाया जाता है। अपराधी उपभोक्ताओं के दैनिक डिजिटल व्यवहार में इस तरह घुसपैठ करते हैं कि जल्दबाजी और भरोसा मिलकर सतर्कता को कमजोर कर देते हैं।
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फ्रॉड की शुरुआत आमतौर पर डर और दबाव बनाने वाले मैसेज से होती है, जो एसएमएस, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जाते हैं। इन संदेशों में गैस कनेक्शन कटने, तत्काल केवाईसी अपडेट या सिलेंडर की सीमित उपलब्धता जैसी बातें लिखी होती हैं। इसके बाद यूजर्स को फर्जी वेबसाइट्स और क्लोन बुकिंग पोर्टल्स पर रीडायरेक्ट किया जाता है, जो असली एलपीजी सर्विस प्रोवाइडर की साइट्स की तरह दिखते हैं, जिससे पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
कई मामलों में साइबर अपराधियों ने मालिशियस APK फाइलों का इस्तेमाल किया है, जिन्हें असली एप्लिकेशन बताकर डाउनलोड कराया जाता है। एक बार इंस्टॉल होने के बाद ये ऐप्स फोन में रिमोट एक्सेस की सुविधा दे देते हैं, जिससे बैंकिंग डिटेल्स, यूपीआई डेटा और अन्य निजी जानकारी चोरी की जा सकती है। मुंबई के एक मामले में 73 वर्षीय सेवानिवृत्त केंद्रीय अधिकारी से ₹3.77 लाख की ठगी हुई, जब उन्हें बिल वेरिफिकेशन के नाम पर फर्जी ऐप इंस्टॉल करने के लिए मजबूर किया गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि ये फ्रॉड नेटवर्क फर्जी पेमेंट फ्लो, नकली कस्टमर सपोर्ट और अनऑथराइज्ड यूपीआई कलेक्शन सिस्टम के जरिए काम करता है। ये सिस्टम लेन-देन के समय पूरी तरह असली जैसे दिखते हैं, लेकिन पेमेंट के बाद सभी संपर्क चैनल बंद कर दिए जाते हैं, जिससे पीड़ितों के पास कोई समाधान नहीं बचता।
साइबर सिक्योरिटी इंटेलिजेंस फर्म mFilterIt ने बताया कि 5,000 से अधिक फर्जी अकाउंट्स और डिजिटल एसेट्स इस बढ़ते फ्रॉड इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। इनका इस्तेमाल फिशिंग लिंक फैलाने, सर्विस प्रोवाइडर बनकर ठगी करने और कई प्लेटफॉर्म्स पर अनधिकृत लेन-देन कराने के लिए किया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम कर रहा है और उपभोक्ता व्यवहार के अनुसार तेजी से अपने तरीकों को बदल रहा है। यह फ्रॉड सिर्फ एक प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि मैसेजिंग ऐप्स, सोशल मीडिया और क्लोन वेबसाइट्स के जरिए समानांतर रूप से चलाया जा रहा है, जिससे इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है।
mFilterIt के को-फाउंडर और CEO अमित रिलन ने कहा कि साइबर अपराधी अब जरूरी सेवाओं से जुड़ी घबराहट, भरोसा और यूजर इंगेजमेंट का फायदा उठा रहे हैं। उनके अनुसार पारंपरिक फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम अब ऐसे तेजी से बदलते नेटवर्क के सामने पर्याप्त नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिक फ्रॉड रोकथाम के लिए AI-आधारित मॉनिटरिंग, रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस और OSINT तकनीकों की जरूरत है, ताकि फर्जी डिजिटल एसेट्स और इम्पर्सोनेशन नेटवर्क को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके। इसके साथ ही उन्होंने सेवा प्रदाताओं, साइबर एजेंसियों और नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के क्राइसिस-ड्रिवन फ्रॉड इसलिए अधिक खतरनाक हैं क्योंकि ये उन सेवाओं को निशाना बनाते हैं जिन्हें उपभोक्ता टाल नहीं सकते। ऐसे में लोग बिना जांच के तुरंत कार्रवाई कर देते हैं, जिससे ठगी की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
लगातार बढ़ते इन मामलों ने डिजिटल भरोसे और उपभोक्ता सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मजबूत वेरिफिकेशन सिस्टम, डिजिटल जागरूकता और सक्रिय निगरानी नहीं बढ़ाई गई, तो ऐसे फ्रॉड अन्य आवश्यक सेवाओं में भी तेजी से फैल सकते हैं।
फिलहाल साइबर एजेंसियां और सुरक्षा संस्थाएं पूरे नेटवर्क की मैपिंग में जुटी हैं, जिसमें फर्जी डोमेन, पेमेंट गेटवे और इम्पर्सोनेशन चैनल शामिल हैं। लक्ष्य यह है कि इस पूरे इकोसिस्टम को उसके विस्तार से पहले ही निष्क्रिय किया जा सके।
