कोच्चि में ₹25 करोड़ के फर्जी ऑनलाइन ट्रेडिंग स्कैम की जांच में मनी लॉन्ड्रिंग, लग्जरी संपत्ति और कारोबारी निवेश के लिंक सामने आए।

₹25 करोड़ की साइबर ठगी से खुला मनी लॉन्ड्रिंग का जाल: फर्जी ट्रेडिंग स्कैम के पैसे से खड़े किए गए करोड़ों के कारोबार

Team The420
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कोच्चि। केरल के कोच्चि में सामने आए ₹25 करोड़ के फर्जी ऑनलाइन ट्रेडिंग घोटाले की जांच अब एक बड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क तक पहुंचती दिखाई दे रही है। शुरुआती तौर पर साइबर फ्रॉड के रूप में दर्ज यह मामला अब करोड़ों रुपये के अवैध धन को वैध कारोबारी निवेशों में बदलने की आशंका के कारण और गंभीर हो गया है। जांच एजेंसियों को संदेह है कि साइबर अपराध से हासिल रकम को अलग-अलग सेक्टरों में निवेश कर संगठित तरीके से छिपाया गया।

मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों से पूछताछ के बाद जांच का दायरा तेजी से बढ़ा है। दोनों आरोपियों को हाल ही में हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसियां अब उनकी कस्टडी रिमांड लेने की तैयारी कर रही हैं ताकि धन के प्रवाह, निवेश नेटवर्क और संभावित सहयोगियों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई जा सके।

यह मामला एर्नाकुलम के एक कारोबारी से फर्जी ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए करोड़ों रुपये की ठगी से जुड़ा है। जांच अधिकारियों के अनुसार, कुल लगभग ₹25 करोड़ की रकम साइबर धोखाधड़ी के जरिए निकाली गई, जिसमें से करीब ₹16 करोड़ की राशि गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े बैंक खातों और नेटवर्क के माध्यम से गुजरी।

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जांच में सामने आया है कि मुख्य आरोपी ने खनन, निर्माण और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कारोबारी निवेश कर रखे थे। अधिकारियों को संदेह है कि साइबर अपराध से अर्जित धन का इस्तेमाल इन व्यवसायों को खड़ा करने या विस्तार देने में किया गया। शुरुआती जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि रकम को कई चरणों में अलग-अलग खातों और संस्थाओं के जरिए घुमाकर वैध निवेश का रूप दिया गया।

जांच एजेंसियों की नजर हैदराबाद स्थित एक आलीशान अपार्टमेंट पर भी है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब ₹25 करोड़ बताई जा रही है। अधिकारियों को शक है कि यह संपत्ति भी कथित अवैध धन से खरीदी गई हो सकती है। इसके अलावा कई कंपनियों, निवेश साझेदारों और मध्यस्थों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई गई है।

सूत्रों के मुताबिक, जांच अब केवल साइबर ठगी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या संगठित तरीके से साइबर अपराध के पैसे को रियल एस्टेट, आईटी, कंस्ट्रक्शन और अन्य सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था। यदि यह आशंका सही साबित होती है, तो यह देश में साइबर अपराध से जुड़े धन शोधन के सबसे बड़े मामलों में से एक माना जा सकता है।

जांच अधिकारियों का कहना है कि आरोपी बेहद सुनियोजित तरीके से काम कर रहे थे। कथित तौर पर फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को तेज मुनाफे का लालच दिया जाता था। निवेशकों का भरोसा जीतने के बाद रकम को अलग-अलग बैंक खातों और शेल कंपनियों के माध्यम से ट्रांसफर किया जाता था ताकि वास्तविक स्रोत को छिपाया जा सके।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, हाल के वर्षों में साइबर अपराध केवल ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं रहा है। अब अपराधी साइबर फ्रॉड से कमाई गई रकम को वैध कारोबारों और संपत्तियों में बदलने के लिए संगठित मनी लॉन्ड्रिंग मॉडल अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि साइबर अपराध और आर्थिक अपराध अब आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं, जिससे जांच एजेंसियों के लिए चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में शुरुआती डिजिटल ट्रांजैक्शन ट्रेल सबसे महत्वपूर्ण सबूत साबित होते हैं। यदि समय रहते बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल वॉलेट डेटा और निवेश लिंक खंगाले जाएं, तो पूरे नेटवर्क का खुलासा संभव हो सकता है।

जांच एजेंसियां अब आरोपियों के डिजिटल उपकरणों, बैंकिंग गतिविधियों, संपत्ति खरीद और कॉरपोरेट लिंक का फोरेंसिक विश्लेषण कर रही हैं। अधिकारियों को उम्मीद है कि पूछताछ और डिजिटल डेटा के आधार पर कई अन्य लोगों और कंपनियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।

यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि साइबर ठगी अब केवल व्यक्तिगत आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रही। अपराधी अब तकनीक, निवेश और कारोबारी ढांचे का इस्तेमाल कर अवैध धन को संगठित आर्थिक नेटवर्क में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे साइबर अपराध देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

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