जत में एक गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी का मामला सामने आया है, जिसमें मंत्रालय से कथित संबंधों का झांसा देकर वाइन शॉप का लाइसेंस दिलाने के नाम पर एक परिवार से ₹40,54,000 की ठगी कर ली गई। इस मामले में रणजित तुकाराम कुंभार और नीशा सगरे के खिलाफ स्थानीय पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया है।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब येळवी क्षेत्र के निवासी आनंदा सुखदेव आवटे ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, अप्रैल 2023 में आरोपी रणजित कुंभार ने उनसे संपर्क किया और जमीन खरीद-बिक्री में मदद का भरोसा दिलाया। बातचीत के दौरान उसने खुद को मंत्रालय से जुड़े प्रभावशाली संपर्कों वाला व्यक्ति बताया और सरकारी कामकाज में आसानी से मदद कराने का दावा किया।
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इसके बाद आरोपी ने वाइन शॉप खोलने के लिए लाइसेंस दिलाने का प्रस्ताव दिया। पीड़ित परिवार को भरोसे में लेकर उसने आवश्यक कागजात मांगे और कहा कि सरकारी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शुरुआत में छोटी रकम मांगी गई, लेकिन धीरे-धीरे फीस, डिपॉजिट, टैक्स और विभिन्न प्रशासनिक खर्चों के नाम पर लगातार पैसे वसूले जाते रहे।
आरोपी ने कथित तौर पर अपने फोन-पे खाते के माध्यम से ₹14,64,000 की राशि प्राप्त की, जबकि उसके कहने पर नीशा सगरे के स्कैनर पर भी ₹50,000 ट्रांसफर कराए गए। इसके अलावा कई बार नकद लेन-देन भी कराया गया, जिससे कुल ठगी की राशि ₹40 लाख से अधिक पहुंच गई।
लंबे समय तक वाइन शॉप लाइसेंस नहीं मिलने पर जब परिवार को शक हुआ, तो उन्होंने खुद स्तर पर जांच शुरू की। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि उन्हें मंत्रालय से जुड़ा कोई वास्तविक प्रोसेस नहीं दिया जा रहा था और पूरा मामला संदिग्ध था। इसके बाद पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
सूत्रों के अनुसार, आरोपी रणजित कुंभार के खिलाफ पहले भी इसी तरह के ठगी के आरोप लग चुके हैं, जिसमें लगभग ₹40 लाख की धोखाधड़ी का मामला सामने आया था। बार-बार एक ही तरह के आरोप सामने आने से यह मामला और गंभीर हो गया है।
इस प्रकार के मामलों में आमतौर पर आरोपी सरकारी पहचान, प्रभावशाली संपर्क और त्वरित अनुमति दिलाने का झांसा देकर लोगों का भरोसा जीतते हैं। इसके बाद दस्तावेजी प्रक्रिया, शुल्क और अन्य औपचारिकताओं के नाम पर अलग-अलग चरणों में पैसे लिए जाते हैं, जिससे पीड़ित को लंबे समय तक धोखे का एहसास नहीं होता।
यह मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि वाइन शॉप लाइसेंस जैसे संवेदनशील अनुमति मामलों में इस तरह की ठगी ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कई लोग अब किसी भी एजेंट या मध्यस्थ पर भरोसा करने से पहले पूरी जांच करने की बात कह रहे हैं।
प्रशासनिक स्तर पर भी ऐसे मामलों को लेकर सतर्कता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के कारण ठग आसानी से पैसे अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर लेते हैं, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
फिलहाल पुलिस मामले की गहन जांच कर रही है और यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस ठगी के पीछे और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं। साथ ही बैंकिंग और डिजिटल ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं ताकि पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सके।
यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि सरकारी कामकाज का झांसा देकर चलने वाले संगठित ठगी गिरोह किस तरह आम लोगों को निशाना बना रहे हैं और लाखों रुपये की चपत लगा रहे हैं।
