नई दिल्ली। आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की प्रक्रिया अब पहले से अधिक डेटा-ड्रिवन और ऑटोमेटेड हो चुकी है, जिसमें आयकर विभाग (Income Tax Department) द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त वित्तीय जानकारी को मिलान कर संभावित गड़बड़ियों की पहचान की जा रही है। इसी क्रम में Annual Information Statement (AIS) और Form 26AS टैक्सपेयर्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गए हैं, जिनमें किसी भी प्रकार का मिसमैच होने पर स्क्रूटनी और नोटिस की संभावना बढ़ जाती है।
आयकर विभाग ने स्पष्ट किया है कि अब सिस्टम आधारित एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से हर टैक्सपेयर्स की आय, निवेश और खर्च का गहन विश्लेषण किया जाता है। ऐसे में सैलरी इनकम, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) ब्याज, डिविडेंड, कैपिटल गेन और TDS से जुड़ी जानकारी का सही मिलान बेहद जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, AIS में बैंक, म्यूचुअल फंड कंपनियां, नियोक्ता और अन्य वित्तीय संस्थानों से प्राप्त डेटा शामिल होता है, जिसे सीधे टैक्स सिस्टम में फीड किया जाता है। यदि टैक्सपेयर्स अपनी ITR फाइलिंग में इन आंकड़ों को सही तरीके से शामिल नहीं करते हैं, तो सिस्टम स्वतः ही इसे संभावित अनियमितता मानकर फ्लैग कर देता है।
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मुंबई स्थित चार्टर्ड अकाउंटेंट डॉ. सुरेश सुराना के अनुसार, टैक्सपेयर्स को केवल AIS पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे Form 16, बैंक स्टेटमेंट, निवेश रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय दस्तावेजों के साथ क्रॉस वेरिफाई करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार AIS में डुप्लीकेट या अधूरी जानकारी भी हो सकती है, जिसे बिना जांचे स्वीकार करना जोखिमपूर्ण साबित हो सकता है।
वहीं कर विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे अधिक स्क्रूटनी उन्हीं मामलों में देखने को मिलती है जहां सैलरी इनकम में अंतर, FD या सेविंग अकाउंट ब्याज की अनदेखी, और TDS क्रेडिट का गलत दावा किया गया हो। इसके अलावा बड़े लेन-देन जैसे संपत्ति खरीद-बिक्री, शेयर बाजार निवेश और विदेशी रेमिटेंस भी अब विभाग की निगरानी में हैं।
AIS आधारित सिस्टम अब न केवल रिटर्न फाइलिंग के बाद, बल्कि उससे पहले ही संभावित त्रुटियों को पहचानने में सक्षम हो चुका है। इसका उद्देश्य टैक्स चोरी को रोकना और कर अनुपालन को अधिक पारदर्शी बनाना है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि डेटा रिपोर्टिंग में मानव और संस्थागत त्रुटियों के कारण कई बार सही टैक्सपेयर्स भी अनावश्यक नोटिस का सामना कर सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, अब बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों द्वारा रिपोर्ट किए गए डेटा का उपयोग कर आयकर विभाग टैक्सपेयर्स की खर्च करने की क्षमता और घोषित आय के बीच भी तुलना कर रहा है। यदि किसी व्यक्ति के खर्च और आय में असामान्य अंतर पाया जाता है, तो वह स्क्रूटनी के दायरे में आ सकता है।
टैक्स सलाहकारों ने सुझाव दिया है कि ITR फाइल करने से पहले सभी वित्तीय दस्तावेजों का सावधानीपूर्वक मिलान करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की जांच या नोटिस से बचा जा सके।
आयकर विभाग की डिजिटल प्रणाली लगातार अधिक उन्नत होती जा रही है और अब डेटा इंटीग्रेशन के जरिए विभिन्न स्रोतों से जानकारी स्वतः अपडेट हो रही है। इस प्रक्रिया से पारदर्शिता बढ़ रही है लेकिन साथ ही टैक्सपेयर्स के लिए अनुपालन की जिम्मेदारी भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि टैक्सपेयर्स अक्सर छोटी गलतियों जैसे बैंक ब्याज को छोड़ना या गलत TDS क्रेडिट दर्ज करना जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। इसके अलावा कई लोग डिजिटल निवेश या शेयर लेनदेन की पूरी जानकारी रिपोर्ट नहीं करते हैं जिससे बाद में मिसमैच उत्पन्न हो जाता है और स्क्रूटनी का जोखिम बढ़ जाता है।
ऐसे में आयकर विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ITR फाइलिंग को अंतिम चरण मानने से पहले सभी रिकॉर्ड का पुनः सत्यापन आवश्यक है ताकि किसी प्रकार की त्रुटि से बचा जा सके और टैक्स अनुपालन पूरी तरह सटीक बना रहे। आयकर विभाग का उद्देश्य पारदर्शी कर व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
