मुंबई/नई दिल्ली। इंडसइंड बैंक से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रहे गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) ने अपनी पड़ताल तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार जांच का फोकस दो प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित है—करीब ₹1,000 करोड़ के संदिग्ध आंतरिक ट्रेजरी ट्रांजैक्शन और माइक्रोफाइनेंस यूनिट भारत फाइनेंशियल इन्क्लूजन लिमिटेड (BFIL) की किताबों में लगभग ₹2,000 करोड़ के लोन एवरग्रीनिंग की संभावना।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, SFIO अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट मई के अंत या जून की शुरुआत तक कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को सौंप सकता है। इस मामले में बैंक की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया है कि वह सभी नियामकीय एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और आरोपों को “अभी अपुष्ट और जांचाधीन” बताया गया है।
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जांच का एक बड़ा हिस्सा बैंक के आंतरिक ट्रेजरी ऑपरेशंस से जुड़ा है, जहां लगभग ₹1,000 करोड़ के लेनदेन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि शुरुआती जांच में यह रकम पहले ₹250 करोड़ तक सीमित थी, लेकिन आगे बढ़ने के साथ यह दायरा बढ़कर ₹1,000 करोड़ तक पहुंच गया। जांच अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ये ट्रेड्स उचित मंजूरी प्रक्रिया के तहत किए गए थे या फिर इनमें आंतरिक नियमों का उल्लंघन हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में आवश्यक दस्तावेज, ईमेल अप्रूवल या स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं पाए गए हैं, जिससे यह संदेह गहराया है कि क्या वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना ट्रेड्स निष्पादित किए गए थे। जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि क्या इन ट्रांजैक्शनों से जुड़े किसी व्यक्ति को वित्तीय लाभ हुआ।
दूसरी ओर, जांच का दायरा BFIL की माइक्रोफाइनेंस गतिविधियों तक भी बढ़ गया है। यहां करीब ₹2,000 करोड़ के लोन से जुड़ी अकाउंटिंग एंट्रीज़ की जांच की जा रही है। आरोप है कि इन एंट्रीज़ के जरिए संभावित रूप से लोन की वास्तविक स्थिति को कम गंभीर दिखाने की कोशिश की गई, जिससे बैलेंस शीट में एनपीए (NPA) की स्थिति को छिपाया जा सके।
सूत्रों के अनुसार, कुछ पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों से पूछताछ की जा रही है, साथ ही ऑडिटर्स से भी इन एंट्रीज़ की वैधता पर सवाल किए गए हैं। जांच एजेंसियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह मामला “एवरग्रीनिंग ऑफ लोन” की श्रेणी में आता है, जिसमें खराब ऋणों को नया दिखाकर छिपाया जाता है।
इस पूरे मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि बैंक के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) ने कथित तौर पर दबाव के चलते पद छोड़ने की बात जांच एजेंसियों को बताई थी। उनका कहना था कि कुछ वित्तीय रिपोर्ट्स को मंजूरी देने पर दबाव बनाया गया था, जिनमें विवादित एंट्रीज़ शामिल थीं।
इसी जांच क्रम में यह भी सामने आया है कि मुंबई आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की शुरुआती जांच के बाद SFIO को विस्तृत जांच सौंपी गई। शुरुआती रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर फंड डायवर्जन के स्पष्ट सबूत नहीं मिले थे, लेकिन संदिग्ध अकाउंटिंग प्रैक्टिसेज को लेकर चिंता जताई गई थी।
बैंक ने स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में कहा था कि उसने सभी आवश्यक प्रावधान पहले ही कर लिए हैं और नियामकीय जांच में पूरा सहयोग जारी है। हालांकि जांच अधिकारियों का मानना है कि मामले की पूरी तस्वीर अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
फिलहाल SFIO डिजिटल ट्रेल, ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड, ईमेल कम्युनिकेशन और ऑडिट डॉक्यूमेंट्स की बारीकी से जांच कर रहा है। आने वाले हफ्तों में यह तय होगा कि यह मामला केवल अकाउंटिंग गड़बड़ियों तक सीमित है या फिर इसमें बड़े वित्तीय अनियमितताओं की भी भूमिका है।
