इंदौर। इंदौर नगर निगम (IMC) से जुड़े बहुचर्चित फर्जी बिल घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी का कहना है कि यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत की गई है, जिसमें नगर निगम के खजाने से फर्जी बिलों और जाली दस्तावेजों के जरिए करोड़ों रुपये निकाले जाने के आरोप हैं। एजेंसी के अनुसार गिरफ्तार किए गए आरोपियों की भूमिका कथित तौर पर फर्जी भुगतान, धन के वितरण और घोटाले से अर्जित रकम के उपयोग से जुड़ी रही है।
ED द्वारा गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बडेरा के रूप में हुई है। एजेंसी ने तीनों को 1 जून को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत हिरासत में लिया था। बाद में उन्हें इंदौर स्थित विशेष PMLA अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत ने आगे की पूछताछ और जांच के लिए 5 जून तक ED की रिमांड मंजूर कर दी।
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मामले की जांच कई प्राथमिकी और आरोपपत्रों के आधार पर शुरू हुई थी। आरोप है कि वर्ष 2018 से 2023 के बीच नगर निगम में ऐसे कार्यों के नाम पर बिल प्रस्तुत किए गए जो वास्तविकता में कभी किए ही नहीं गए। जांच एजेंसी के अनुसार लगभग ₹119.53 करोड़ के फर्जी और जाली बिल नगर निगम के समक्ष पेश किए गए थे। इन दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम के खजाने से करीब ₹86.54 करोड़ का भुगतान जारी किया गया।
ED का दावा है कि जांच के दौरान यह भी सामने आया कि वर्ष 2018 से पहले भी इसी तरह के तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर लगभग ₹6.22 करोड़ की सार्वजनिक धनराशि का दुरुपयोग किया गया था। इस तरह अब तक कुल कथित वित्तीय अनियमितता का आंकड़ा लगभग ₹92.76 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसे एजेंसी अपराध से अर्जित आय (Proceeds of Crime) मान रही है।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों द्वारा नियंत्रित विभिन्न फर्मों के नाम पर कथित तौर पर फर्जी बिल प्रस्तुत किए गए। इन बिलों के आधार पर भुगतान जारी हुआ, लेकिन बदले में कोई वास्तविक कार्य नहीं किया गया। एजेंसी का आरोप है कि इससे नगर निगम को आर्थिक नुकसान हुआ जबकि संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं को अवैध वित्तीय लाभ प्राप्त हुआ।
मामले में गिरफ्तार अभय सिंह राठौर उस समय नगर निगम में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत था। जांच एजेंसी का दावा है कि वह कथित साजिश के प्रमुख किरदारों में शामिल था और फर्जी कार्य आदेश तैयार कराने तथा उनकी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वहीं मोहम्मद जाकिर और राहुल बडेरा पर आरोप है कि उनकी फर्मों को फर्जी बिलों के आधार पर नगर निगम के खजाने से भारी भुगतान प्राप्त हुआ।
ED के अनुसार जांच में यह पाया गया है कि दोनों ठेकेदारों से जुड़ी फर्मों को कथित तौर पर लगभग ₹71.78 करोड़ की राशि मिली। एजेंसी का आरोप है कि इन फर्मों ने न केवल फर्जी बिलों की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि कथित धोखाधड़ी से प्राप्त धनराशि को विभिन्न लाभार्थियों तक पहुंचाने में भी योगदान दिया।
यह पहली बार नहीं है जब इस मामले में ED ने बड़ी कार्रवाई की हो। इससे पहले एजेंसी ने PMLA की धारा 17 के तहत तलाशी अभियान चलाकर लगभग ₹22.04 करोड़ मूल्य की नकदी और अन्य कीमती संपत्तियां बरामद की थीं। इसके अलावा जुलाई 2025 में लगभग ₹34 करोड़ मूल्य की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क भी किया गया था।
जांच एजेंसी का कहना है कि मामले में धन के पूरे प्रवाह का पता लगाने का काम अभी जारी है। अधिकारी बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन, संपत्ति रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं ताकि कथित घोटाले से जुड़े सभी लाभार्थियों की पहचान की जा सके। ED का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ और भी महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं तथा कथित अवैध धन से अर्जित अतिरिक्त संपत्तियों का पता चल सकता है। फिलहाल तीनों आरोपियों से पूछताछ जारी है और मामले की जांच निर्णायक चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है।
