चंडीगढ़। निजी अस्पतालों में इलाज पैकेज के नाम पर कथित अतिरिक्त वसूली को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए हरियाणा सरकार को 85 वर्षीय मरीज के इलाज पर खर्च हुए ₹7.42 लाख की पूरी राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि मरीजों को आकर्षित करने के लिए कम पैकेज दरें दिखाना और बाद में जरूरी दवाइयों, उपकरणों व प्रक्रियाओं के नाम पर अलग से भारी रकम वसूलना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
मामला एक बुजुर्ग मरीज से जुड़ा है, जिसने अप्रैल 2023 में पंचकूला के एक निजी अस्पताल में कोरोनरी आर्टरी डिजीज का इलाज कराया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि अस्पताल ने शुरुआत में एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी के लिए लगभग ₹1.05 लाख तथा रोटाब्लेशन पैकेज के लिए ₹30,000 की जानकारी दी थी, लेकिन बाद में दवाइयों और कंज्यूमेबल्स के नाम पर अतिरिक्त ₹6.02 लाख का बिल जोड़ दिया गया। इसके बाद कुल बिल ₹7.42 लाख तक पहुंच गया।
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याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि अस्पताल प्रशासन ने मरीज के परिजनों को भरोसा दिलाया था कि पैकेज में भर्ती और प्रक्रिया से जुड़े लगभग सभी खर्च शामिल होंगे। हालांकि डिस्चार्ज के समय जो अंतिम बिल सौंपा गया, वह शुरुआती पैकेज राशि से कई गुना अधिक था। अदालत ने इस तर्क को गंभीर मानते हुए अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था पर सवाल उठाए।
न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने आदेश में कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी नीतियों का उद्देश्य लोगों का जीवन बचाना है, न कि उन्हें तकनीकी शर्तों और अस्पष्ट शुल्कों के जाल में फंसाना। अदालत ने टिप्पणी की कि संबंधित पक्षों ने नीति की “भावना” को नजरअंदाज करते हुए केवल उसके शब्दों का पालन करने का प्रयास किया है।
हाईकोर्ट ने हरियाणा के डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज (DGHS) को निर्देश दिया कि राज्य के सभी सूचीबद्ध निजी अस्पतालों की पैकेज दरों की जांच कराई जाए। अदालत ने कहा कि यह सत्यापित किया जाए कि कहीं अस्पताल कम पैकेज दिखाकर बाद में आवश्यक उपचार सामग्री और प्रक्रियाओं के नाम पर अतिरिक्त राशि तो नहीं वसूल रहे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अस्पताल नीति उल्लंघन करता पाया जाता है तो उसके खिलाफ लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इलाज का पूरा खर्च मरीज या उसके परिजनों को उनकी समझ की भाषा में स्पष्ट रूप से बताया जाए। अदालत ने कहा कि केवल तैयार फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। मरीजों को यह जानकारी होनी चाहिए कि पैकेज में कौन-कौन सी सेवाएं शामिल हैं और किन परिस्थितियों में अतिरिक्त शुल्क लिया जा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने कोरोनरी आर्टरी डिजीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी (IVL) तकनीक को भी राज्य के मानक पैकेज में शामिल करने पर विचार करने को कहा है। अदालत का मानना था कि नई चिकित्सा तकनीकों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए पैकेज नीतियों को समय-समय पर अपडेट किया जाना जरूरी है, ताकि मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
हाईकोर्ट ने DGHS को तीन महीने के भीतर पूरी जांच और समीक्षा प्रक्रिया पूरी कर अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। इस फैसले को स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता और निजी अस्पतालों की बिलिंग प्रणाली पर निगरानी के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आदेश के बाद राज्य में अस्पताल पैकेज और मेडिकल बिलिंग की प्रक्रियाओं की व्यापक समीक्षा हो सकती है, जिससे मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ेगी।
