देशभर में तेजी से फैल रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड के मामलों के बीच गुरुग्राम में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, जिसने कथित तौर पर साइबर ठगों को अपना बैंक खाता उपलब्ध कराया था। जांच में सामने आया है कि इसी खाते में एक महिला से ठगी गई ₹8.30 लाख की रकम जमा कराई गई थी। गिरफ्तार आरोपी की पहचान उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी विजय कुमार के रूप में हुई है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब गुरुग्राम की एक महिला ने साइबर अपराध थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, उसे व्हाट्सएप के माध्यम से कॉल प्राप्त हुई, जिसमें कॉल करने वालों ने खुद को सरकारी और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जुड़ा अधिकारी बताया। कॉलर्स ने महिला को बताया कि उसका लैंडलाइन नंबर और पहचान संबंधी दस्तावेज कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
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शिकायत के अनुसार, साइबर ठगों ने महिला को गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई और लंबी जांच का भय दिखाया। उसे विश्वास दिलाया गया कि वह एक गंभीर आपराधिक मामले के दायरे में है और यदि उसने उनके निर्देशों का पालन नहीं किया तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो सकती है। लगातार मानसिक दबाव और डर का माहौल बनाकर आरोपियों ने महिला को विभिन्न बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर दिया।
शिकायत मिलने के बाद साइबर अपराध थाने में मामला दर्ज किया गया और जांच शुरू की गई। बैंक खातों, डिजिटल रिकॉर्ड और लेनदेन की पड़ताल के दौरान जांच टीम को महत्वपूर्ण सुराग मिले, जिनके आधार पर आरोपी तक पहुंचा गया।
जांच के क्रम में पुलिस ने 5 जून को हापुड़ से विजय कुमार को गिरफ्तार किया। उसके कब्जे से एक मोबाइल फोन भी बरामद किया गया, जिसका उपयोग कथित तौर पर साइबर अपराध से जुड़ी गतिविधियों में किया गया था। अदालत में पेशी के बाद आरोपी को पुलिस रिमांड पर लिया गया ताकि पूरे साइबर नेटवर्क और धन के प्रवाह के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई जा सके।
पूछताछ के दौरान सामने आया कि पीड़िता से ठगी गई ₹8.30 लाख की राशि आरोपी के बैंक खाते में जमा की गई थी। प्रारंभिक जांच में आरोपी ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उसने अपना बैंक खाता एक अन्य व्यक्ति को ₹50,000 के बदले उपलब्ध कराया था। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस खाते का इस्तेमाल साइबर अपराध से प्राप्त धन को प्राप्त करने और आगे स्थानांतरित करने के लिए किया गया।
साइबर अपराध की दुनिया में ऐसे खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है। इन खातों का उपयोग अपराधी गिरोह चोरी या ठगी की रकम को विभिन्न खातों में घुमाने और वास्तविक लाभार्थियों की पहचान छिपाने के लिए करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, म्यूल अकाउंट साइबर अपराध नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से धन का स्रोत और अंतिम गंतव्य छिपाया जाता है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ठगी की रकम आगे किन खातों में भेजी गई, इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं तथा क्या आरोपी पहले भी ऐसे मामलों में प्रयुक्त हो चुका है। अधिकारियों को संदेह है कि मामला किसी बड़े साइबर ठगी गिरोह से जुड़ा हो सकता है, जो विभिन्न राज्यों में लोगों को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर निशाना बना रहा है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अधिकांश मामलों में अपराधी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेते हैं। वे पीड़ितों के मन में भय पैदा करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि वे किसी गंभीर सरकारी जांच के दायरे में हैं। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का फायदा उठाकर उनसे पैसे ट्रांसफर कराए जाते हैं।
विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि कोई भी सरकारी एजेंसी या जांच संस्था फोन या वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती। यदि कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाए, तो उसकी सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर दी जानी चाहिए।
गुरुग्राम का यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि साइबर अपराधी अब तकनीकी कमजोरियों के साथ-साथ लोगों के डर और भरोसे का भी फायदा उठा रहे हैं। ऐसे में सतर्कता और जागरूकता ही इस तरह की ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है।
