नई दिल्ली। “आपका नाम मनी लॉन्ड्रिंग केस में आया है…”, “आपके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है…”, “किसी को फोन मत कीजिए, आप डिजिटल अरेस्ट में हैं…” — पिछले कुछ समय में ऐसे फोन कॉल और वीडियो कॉल देशभर में हजारों लोगों के लिए डर और आर्थिक बर्बादी का कारण बन चुके हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम से फैल रहा यह नया साइबर फ्रॉड अब भारत में तेजी से संगठित अपराध का रूप ले चुका है।
साइबर अपराधी खुद को CBI, ED, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, पुलिस अधिकारी या यहां तक कि जज बताकर लोगों को डराते हैं और उन्हें घंटों वीडियो कॉल पर “निगरानी” में रखते हैं। इस दौरान पीड़ित को किसी से बात करने, फोन काटने या बाहर जाने तक से रोका जाता है। भय और मानसिक दबाव का फायदा उठाकर उनसे बैंक खातों की जानकारी ली जाती है और करोड़ों रुपये ठग लिए जाते हैं।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
गृह मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2024 से देश में 92 हजार से अधिक ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। इन मामलों में हजारों करोड़ रुपये की साइबर ठगी की आशंका जताई गई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि यह साइबर अपराध का तेजी से फैलता हुआ नया मॉडल है, जिसमें मनोवैज्ञानिक दबाव और तकनीकी धोखे का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मुंबई की रहने वाली स्वाति नामक एक महिला ने बताया कि उन्हें एक कॉल आया जिसमें खुद को TRAI अधिकारी बताने वाले व्यक्ति ने कहा कि उनके मोबाइल नंबर का इस्तेमाल आपराधिक गतिविधियों में हुआ है। इसके बाद कॉल को कथित पुलिस जांच से जोड़ दिया गया और उन्हें डराकर ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करने के लिए मजबूर किया गया। कुछ ही घंटों में उनके खाते से हजारों रुपये निकल गए।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानूनी प्रावधान भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी देश में मौजूद नहीं है। यह पूरी तरह साइबर अपराधियों द्वारा बनाया गया मनोवैज्ञानिक जाल है। अपराधी पहले पीड़ित को डराते हैं, फिर उसे सामाजिक रूप से अलग करते हैं और अंत में आर्थिक शोषण करते हैं।”
उन्होंने कहा कि ऐसे गिरोह बेहद पेशेवर तरीके से काम करते हैं। वीडियो कॉल के दौरान नकली पुलिस स्टेशन, फर्जी दस्तावेज, पुलिस यूनिफॉर्म और सरकारी लोगो तक का इस्तेमाल किया जाता है ताकि पीड़ित को लगे कि कार्रवाई वास्तविक है। कई मामलों में लोगों को स्काइप या अन्य वीडियो ऐप डाउनलोड करवाकर घंटों निगरानी में रखा जाता है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इन साइबर नेटवर्क्स के तार कई विदेशी देशों तक जुड़े हो सकते हैं। रिपोर्ट्स में कंबोडिया, म्यांमार, लाओस, वियतनाम और थाईलैंड स्थित कॉल सेंटरों का जिक्र किया गया है, जहां से भारतीय नागरिकों को निशाना बनाया जाता है। हालांकि, करीब 30 से 40 प्रतिशत गतिविधियों का संचालन भारत के भीतर से भी होने की आशंका जताई गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अक्सर उन लोगों को निशाना बनाते हैं जो कानून प्रवर्तन एजेंसियों से भयभीत रहते हैं। वरिष्ठ नागरिक, रिटायर्ड अधिकारी, कारोबारी और मध्यम वर्गीय परिवार ऐसे मामलों में ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई युवा भी इन ठगों के जाल में फंस रहे हैं क्योंकि उन्हें वास्तविक सरकारी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होती।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लोगों को ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड से सतर्क रहने की सलाह दे चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करती।
गृह मंत्रालय और CERT-In ने भी एडवाइजरी जारी कर लोगों से अपील की है कि किसी भी धमकी भरे कॉल पर घबराएं नहीं, किसी को पैसे ट्रांसफर न करें और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अपराधों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता है। लोगों को समझना होगा कि कोई भी जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर पूछताछ या “डिजिटल अरेस्ट” जैसी प्रक्रिया नहीं अपनाती। डर, जल्दबाजी और गोपनीयता का दबाव ही इन साइबर ठगों का सबसे बड़ा हथियार है।
