बेंगलुरु। देश के बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अहम कार्रवाई करते हुए दीपक केबल्स (इंडिया) लिमिटेड से जुड़े मामले में कंपनी के निदेशक के. वेंकटेश्वर राव को गिरफ्तार किया है। मामला करीब ₹899 करोड़ की कथित बैंक धोखाधड़ी और ऋण राशि के दुरुपयोग से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि कंपनी ने बैंकों से बड़े पैमाने पर ऋण सुविधाएं हासिल करने के लिए वित्तीय दस्तावेजों में हेरफेर किया और बाद में उस धनराशि को विभिन्न संबंधित संस्थाओं में स्थानांतरित कर दिया।
जांच के अनुसार, यह मामला उस शिकायत से जुड़ा है जिसमें भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकों के एक कंसोर्टियम को लगभग ₹899.35 करोड़ का नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि कंपनी ने अपनी वास्तविक वित्तीय स्थिति छिपाने के लिए फर्जी वित्तीय विवरण प्रस्तुत किए और बैंक ऋण जारी रखने के लिए खातों में कथित रूप से हेरफेर किया।
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प्रवर्तन निदेशालय ने हाल ही में बेंगलुरु और अन्य स्थानों पर कंपनी तथा उससे जुड़े व्यक्तियों के परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए। एजेंसी ने सोने के आभूषण और नकदी सहित लगभग ₹1.27 करोड़ की संपत्ति जब्त की है, जबकि करीब ₹18 करोड़ की राशि वाले विभिन्न बैंक खातों को अस्थायी रूप से फ्रीज किया गया है।
अधिकारियों के अनुसार, जांच में यह सामने आया है कि कंपनी ने कथित रूप से कई संस्थाओं का उपयोग फर्जी बिक्री और खरीद दिखाने के लिए किया। इसके अलावा सर्कुलर ट्रेडिंग, नकली कॉरपोरेट गारंटी और कागजी लेनदेन के माध्यम से कारोबार का आकार वास्तविकता से अधिक प्रदर्शित किया गया। आरोप है कि इन गतिविधियों का उद्देश्य बैंकों से अधिक ऋण सीमा प्राप्त करना और पहले से लिए गए ऋण को लगातार चालू दिखाना था।
जांच एजेंसियों का दावा है कि ऋण राशि का बड़ा हिस्सा उन कंपनियों और संस्थाओं में भेजा गया जो सीधे या परोक्ष रूप से आरोपी के नियंत्रण में थीं। इन लेनदेन के पीछे किसी स्पष्ट व्यावसायिक उद्देश्य के संकेत नहीं मिले हैं। अधिकारियों का मानना है कि धनराशि को कई स्तरों पर घुमाकर उसके वास्तविक स्रोत को छिपाने की कोशिश की गई।
मामले की जड़ें कई वर्षों पुरानी बताई जा रही हैं। बैंकिंग क्षेत्र में सामने आई अनियमितताओं और फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं। प्रारंभिक जांच में वित्तीय रिकॉर्ड, संपार्श्विक संपत्तियों और ऋण उपयोग से जुड़े कई संदिग्ध पहलू सामने आए, जिसके बाद मामला केंद्रीय जांच एजेंसियों तक पहुंचा।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि बड़े वित्तीय घोटालों में अक्सर फर्जी दस्तावेज, संबंधित कंपनियों के माध्यम से फंड डायवर्जन और कृत्रिम कारोबार दिखाने जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। उनके अनुसार बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता, नियमित ऑडिट और डिजिटल निगरानी ऐसे मामलों को समय रहते पकड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जांच एजेंसियां अब कंपनी के वित्तीय लेनदेन, संबंधित कंपनियों, निदेशकों और अन्य सहयोगियों की भूमिका की गहन पड़ताल कर रही हैं। अधिकारियों को आशंका है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस मामले में और भी वित्तीय अनियमितताओं तथा संभावित लाभार्थियों के नाम सामने आ सकते हैं। फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित धोखाधड़ी का पूरा नेटवर्क कितना व्यापक था तथा इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही।
