बॉम्बे हाई कोर्ट ने बिना शो-कॉज नोटिस और सुनवाई के लगाए गए Union Bank के ‘फ्रॉड टैग’ को रद्द किया।

₹21.80 करोड़ बैंकिंग विवाद में बड़ा झटका: बॉम्बे हाई कोर्ट ने यूनियन बैंक का ‘फ्रॉड टैग’ रद्द किया, कारोबारी को मिली राहत

Team The420
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₹21.80 करोड़ के बैंकिंग घोटाले से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मुंबई स्थित कारोबारी कमलेश कनुंगो के खाते को ‘फ्रॉड’ घोषित किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी गंभीर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

अदालत ने कहा कि बैंक ने यह कार्रवाई बिना शो कॉज नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए की थी, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है। अदालत के अनुसार किसी भी उधारकर्ता या प्रमोटर के खिलाफ इस तरह की प्रतिकूल कार्रवाई से पहले पारदर्शी प्रक्रिया और जवाब देने का पूरा मौका देना आवश्यक है।

मामला उस आरोप से जुड़ा है जिसमें यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने दावा किया था कि वर्ष 2008 से 2018 के बीच ₹21.80 करोड़ की कथित धोखाधड़ी की गई। बैंक का कहना था कि फोरेंसिक ऑडिट में कई अनियमितताएँ सामने आईं, जिनमें लगभग ₹9.46 करोड़ की निकासी व्यक्तिगत खातों में जाने और कंपनी के टर्नओवर का बड़ा हिस्सा अन्य बैंकों के माध्यम से संचालित होने जैसे आरोप शामिल थे।

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कमलेश कनुंगो ने अदालत में दलील दी कि बैंक ने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का गलत उपयोग किया और उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 2024 में संशोधित आरबीआई गाइडलाइंस के तहत किसी भी खाते को फ्रॉड घोषित करने से पहले नोटिस और विस्तृत जानकारी देना अनिवार्य है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बैंकों को किसी भी प्रतिकूल निर्णय से पहले सभी लेनदेन और आरोपों का पूरा ब्योरा संबंधित पक्ष को देना चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि प्रक्रिया में निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है।

इस फैसले के बाद अदालत ने Union Bank of India को यह छूट दी कि वह नए सिरे से आरबीआई के संशोधित ढांचे के तहत उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए कार्रवाई शुरू कर सकता है। यह निर्णय बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

इस मामले में अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वित्तीय संस्थानों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप जैसे फ्रॉड वर्गीकरण का प्रभाव केवल बैंकिंग रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह किसी कारोबारी की साख और भविष्य के व्यापारिक अवसरों पर भी सीधा असर डालता है। इसलिए ऐसी कार्रवाई से पहले प्रक्रिया का पूरी तरह पालन होना अनिवार्य माना गया।

अदालत के अनुसार आरबीआई द्वारा समय-समय पर जारी दिशानिर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी खाते को फ्रॉड घोषित करने से पहले कारण बताओ नोटिस देना और विस्तृत दस्तावेज उपलब्ध कराना जरूरी है। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति को बिना अवसर दिए दंडात्मक कार्रवाई का सामना न करना पड़े।

इस पूरे विवाद का संबंध म/s Trison Impex से है, जिसकी स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी। बैंक ने आरोप लगाया था कि फंड के उपयोग में अनियमितताएँ पाई गईं और कई लेनदेन बिना पर्याप्त दस्तावेज के किए गए।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक को नए सिरे से कार्रवाई करने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वह पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ सभी नियमों का पालन करे। इस फैसले को बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है, जिसमें कहा गया है कि नियामकीय कार्रवाई और प्राकृतिक न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

इस निर्णय के बाद कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में बैंकिंग संस्थाओं को अब अधिक सतर्क रहकर प्रक्रिया का पालन करना होगा, क्योंकि किसी भी त्रुटि से बड़े कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं और वित्तीय कार्रवाइयों की वैधता पर सवाल उठ सकता है।

कुल मिलाकर यह मामला बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े नियमों की व्याख्या को और मजबूत करता है तथा यह स्पष्ट संदेश देता है कि किसी भी संस्था द्वारा की गई दंडात्मक कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है।

इस तरह अदालत का यह आदेश आने वाले समय में बैंकिंग प्रक्रियाओं में अधिक सावधानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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