बेंगलुरु। देशभर में तेजी से फैल रहे “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड का एक और चौंकाने वाला मामला कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से सामने आया है। यहां साइबर ठगों ने मुंबई क्राइम ब्रांच अधिकारी और फर्जी जज बनकर 76 वर्षीय बुजुर्ग को कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखा और कथित मनी लॉन्ड्रिंग जांच के नाम पर उनसे ₹16.24 लाख की रकम ठग ली। आरोपियों ने व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए नकली कोर्ट सुनवाई तक आयोजित की, जिससे बुजुर्ग को लगा कि उनके खिलाफ वास्तविक आपराधिक कार्रवाई चल रही है।
मामला शहर के पाई लेआउट इलाके का है। पीड़ित बुजुर्ग ने दक्षिण-पूर्व साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत के आधार पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
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पीड़ित के अनुसार, 16 फरवरी 2026 को उन्हें व्हाट्सऐप पर एक कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को “राकेश गुप्ता” बताते हुए मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी होने का दावा किया। आरोपी ने कहा कि पीड़ित के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर जारी किए गए मोबाइल नंबर से अवैध और अश्लील संदेश भेजे जा रहे हैं तथा इस मामले में कई शिकायतें दर्ज हुई हैं।
शुरुआती बातचीत के बाद साइबर ठगों ने बुजुर्ग को लगातार कॉल और मैसेज कर मानसिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद एक अन्य व्यक्ति ने संपर्क किया और खुद को “विजय खन्ना” बताते हुए दावा किया कि पीड़ित का बैंक खाता ₹2 करोड़ से ₹3 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग जांच में इस्तेमाल हुआ है। आरोपी ने कहा कि पूछताछ के लिए उन्हें मुंबई आना होगा।
जब बुजुर्ग ने उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए यात्रा करने में असमर्थता जताई, तब आरोपियों ने उन्हें कथित “क्राइम ब्रांच कोर्ट” में ऑनलाइन पेशी का विकल्प दिया। इसके बाद व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए एक व्यक्ति जज की भूमिका में सामने आया और नकली अदालत जैसी कार्यवाही की गई।
शिकायत के मुताबिक, वीडियो कॉल के दौरान कथित जज ने पीड़ित को गिरफ्तारी की धमकी दी, लेकिन उम्र को देखते हुए जमानत मिलने का झूठा भरोसा भी दिलाया। साइबर ठगों ने पूरी प्रक्रिया को इतना वास्तविक दिखाया कि बुजुर्ग को यकीन हो गया कि उनके खिलाफ सरकारी एजेंसियों द्वारा जांच की जा रही है।
इसके बाद आरोपियों ने कहा कि जांच पूरी होने तक उनके बैंक खाते में मौजूद रकम को “वेरिफिकेशन” के लिए अस्थायी रूप से ट्रांसफर करना होगा। साथ ही यह भरोसा भी दिया गया कि जांच समाप्त होने के बाद पूरी राशि वापस कर दी जाएगी। डर और मानसिक दबाव में आकर पीड़ित ने आरोपियों द्वारा बताए गए बैंक खातों में RTGS और IMPS के जरिए अलग-अलग ट्रांजैक्शन में कुल ₹16,24,107 ट्रांसफर कर दिए।
कुछ समय बाद जब आरोपियों से संपर्क टूट गया और पैसे वापस नहीं मिले, तब पीड़ित को अपने साथ हुई ठगी का एहसास हुआ। बाद में उन्होंने परिवार और दोस्तों से इस बारे में चर्चा की, जिसके बाद उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि “डिजिटल अरेस्ट” ठगी में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, ट्राई या कोर्ट अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। नकली दस्तावेज, फर्जी नोटिस, वीडियो कॉल और बनावटी कानूनी प्रक्रिया दिखाकर पीड़ित को मानसिक रूप से इतना कमजोर कर दिया जाता है कि वह बिना जांच-पड़ताल के पैसे ट्रांसफर कर देता है।
महत्वपूर्ण साइबर अपराध मामलों पर अपनी राय रखते हुए प्रसिद्ध साइबर विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा है कि साइबर अपराधी अब सोशल इंजीनियरिंग और मनोवैज्ञानिक दबाव का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या बैंक खाते की “वेरिफिकेशन” के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती। ऐसे मामलों में तुरंत कॉल काटकर साइबर हेल्पलाइन 1930 या स्थानीय पुलिस से संपर्क करना चाहिए।
फिलहाल पुलिस बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की जांच कर रही है। शुरुआती जांच में आशंका जताई जा रही है कि यह एक संगठित साइबर गिरोह का काम हो सकता है, जिसने देशभर में इसी तरह कई लोगों को निशाना बनाया है।
