बीड के ₹241 करोड़ जायकवाड़ी भूमि अधिग्रहण घोटाले में पूर्व जिलाधिकारी अविनाश पाठक को फर्जी हस्ताक्षरों और पुराने आदेशों के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

₹241 करोड़ के भूमि अधिग्रहण घोटाले में पूर्व जिलाधिकारी गिरफ्तार: फर्जी हस्ताक्षरों से जारी हुए करोड़ों के आदेश

Team The420
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छत्रपति संभाजीनगर। महाराष्ट्र के बीड जिले में सामने आए बहुचर्चित भूमि अधिग्रहण घोटाले में बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। जायकवाड़ी परियोजना से जुड़े कथित ₹241.62 करोड़ के भूमि अधिग्रहण घोटाले में बीड के तत्कालीन जिलाधिकारी अविनाश पाठक को गिरफ्तार कर लिया गया है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि फर्जी हस्ताक्षरों और पुरानी तारीख वाले आदेशों के जरिए करोड़ों रुपये के अतिरिक्त मुआवजे को मंजूरी दी गई थी। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी की गिरफ्तारी के बाद पूरे प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है।

जांच अधिकारियों के अनुसार, भूमि अधिग्रहण से संबंधित 154 मामलों में कथित तौर पर फर्जी आदेश तैयार किए गए थे। इन आदेशों के आधार पर लगभग ₹241 करोड़ से अधिक के अतिरिक्त मुआवजे को स्वीकृति दी गई। जांच में यह भी सामने आया कि कई आदेशों पर तत्कालीन जिलाधिकारी के नाम, पदनाम और कथित हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया था। अधिकारियों को संदेह है कि यह पूरी प्रक्रिया सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई।

मामले की जांच के दौरान पुलिस ने कर्मचारियों के मोबाइल संवाद, व्हाट्सऐप बातचीत, प्रशासनिक फाइलें और दस्तावेजी अभिलेख जब्त किए। शुरुआती जांच में फर्जी हस्ताक्षरों और पुरानी तारीख वाले आदेशों के जरिए सरकारी प्रक्रिया को प्रभावित करने के संकेत मिले। इसके बाद जांच एजेंसियों ने हस्ताक्षर नमूनों की वैज्ञानिक जांच शुरू की।

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सूत्रों के मुताबिक, अविनाश पाठक को पूछताछ के लिए नोटिस जारी किया गया था, जिसके बाद वह जांच दल के सामने पेश हुए। कई घंटों तक चली पूछताछ के दौरान अधिकारियों ने उनके हस्ताक्षरों के नमूने लिए और उन्हें हस्तलेखन विशेषज्ञों के पास परीक्षण के लिए भेजा गया। बाद में जांच एजेंसियों ने दावा किया कि मामले में उनकी भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत सामने आए, जिसके आधार पर उन्हें हिरासत में लिया गया।

जांच अधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसमें संगठित आर्थिक अनियमितताओं और सरकारी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग की आशंका भी है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी आदेश तैयार करने, उन्हें मंजूरी दिलाने और भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में किन-किन लोगों की भूमिका थी।

इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब वर्तमान जिलाधिकारी विवेक जॉनसन ने जायकवाड़ी भूमि अधिग्रहण कार्यालय का निरीक्षण किया। जांच के दौरान उन्हें पुरानी तारीखों वाले आदेश और संदिग्ध भुगतान प्रक्रियाएं दिखाई दीं। इसके बाद कर्मचारियों के बीच हुई बातचीत और दस्तावेजों की समीक्षा में कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं। मामले की शिकायत दर्ज होने के बाद विशेष जांच दल गठित किया गया।

जांच में कुछ प्रशासनिक कर्मचारियों, संविदा कर्मियों और सेवानिवृत्त अधिकारियों के नाम भी सामने आए हैं। अधिकारियों को संदेह है कि कथित फर्जीवाड़े के लिए एक संगठित तंत्र की तरह काम किया गया, जिसमें दस्तावेज तैयार करने, हस्ताक्षर लगाने, फाइलें आगे बढ़ाने और भुगतान स्वीकृत कराने की अलग-अलग जिम्मेदारियां तय थीं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण मामलों में बड़ी रकम और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की आशंका अधिक रहती है। यदि डिजिटल अभिलेख, ई-फाइलिंग प्रणाली और भुगतान प्रक्रियाओं की निगरानी मजबूत न हो, तो फर्जी आदेशों और नकली दस्तावेजों के जरिए करोड़ों रुपये का दुरुपयोग संभव हो सकता है।

आर्थिक अपराध और डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में दस्तावेज सत्यापन, डिजिटल गतिविधि अभिलेख, ईमेल रिकॉर्ड, हस्ताक्षर विश्लेषण और संचार विवरण सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित होते हैं। यदि डिजिटल गतिविधियों का रिकॉर्ड सही समय पर सुरक्षित कर लिया जाए, तो पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सकता है।

जांच एजेंसियां अब संबंधित बैंक लेनदेन, प्रशासनिक फाइल गतिविधियों, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल दस्तावेजों का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण कर रही हैं। अधिकारियों को उम्मीद है कि आगे की जांच में कई अन्य लोगों और संभावित लाभार्थियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।

यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि सरकारी परियोजनाओं में डिजिटल और प्रशासनिक सुरक्षा की कमजोरियां किस तरह बड़े आर्थिक घोटालों का रास्ता बन सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी ई-शासन, वास्तविक समय ऑडिट और मजबूत डिजिटल सत्यापन तंत्र के बिना ऐसे संगठित वित्तीय अपराधों को रोकना बेहद चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

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