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बिना दस्तखत, बिना आवेदन और खाते पर ₹20 लाख का लोन; बलरामपुर में बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल

Team The420
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बलरामपुर। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले से सामने आए एक कथित बैंकिंग अनियमितता के मामले ने ग्राहकों की जमा पूंजी की सुरक्षा और बैंकिंग प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक किसान ने आरोप लगाया है कि उसकी जानकारी, सहमति और किसी भी औपचारिक आवेदन के बिना उसके नाम पर ₹20 लाख से अधिक का ऋण स्वीकृत कर दिया गया। मामले का खुलासा तब हुआ जब वह अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) की रकम से संबंधित कार्य के लिए बैंक पहुंचा और उसे अपने खाते पर बकाया ऋण होने की जानकारी मिली।

मामला श्रीदत्तगंज क्षेत्र की चमरूपुर-महदेइया स्थित इंडियन बैंक शाखा से जुड़ा है। शिकायतकर्ता जनार्दन सिंह, जो उतरौला क्षेत्र के नयानगर विशुनपुर गांव के निवासी हैं, ने पुलिस को दी गई तहरीर में आरोप लगाया है कि उनकी जमा पूंजी और बैंक खाते से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल उनकी अनुमति के बिना किया गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

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जनार्दन सिंह के अनुसार उन्होंने कुछ समय पहले अपनी कृषि भूमि बेचकर प्राप्त लगभग ₹22 लाख की राशि बैंक में जमा कराई थी। भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस रकम की फिक्स्ड डिपॉजिट भी कराई गई थी। उनका कहना है कि उन्होंने बैंक पर भरोसा करते हुए अपनी जीवनभर की कमाई वहां सुरक्षित रखी थी। उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उनके नाम पर किसी प्रकार की वित्तीय देनदारी दर्ज हो सकती है।

किसान का आरोप है कि शाखा के तत्कालीन प्रबंधक ने कथित रूप से अन्य संबंधित लोगों की मिलीभगत से उनके नाम पर ₹20 लाख से अधिक का ऋण स्वीकृत करा दिया। उनका दावा है कि उन्होंने न तो कोई ऋण आवेदन भरा, न किसी ऋण दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और न ही किसी प्रकार की सहमति दी। इसके बावजूद बैंक रिकॉर्ड में उनके खाते से जुड़ा ऋण दर्ज पाया गया।

घटना की जानकारी उस समय सामने आई जब जनार्दन सिंह बैंक पहुंचे और अपनी एफडी से संबंधित जानकारी लेने लगे। इसी दौरान उन्हें बताया गया कि उनके खाते पर एक बड़ा ऋण बकाया है। यह सुनकर वह स्तब्ध रह गए। उन्होंने तत्काल बैंक अधिकारियों से जानकारी मांगी और बाद में पूरे मामले की शिकायत पुलिस से की।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 316(5) और 318(4) के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मामले की जांच शुरू कर दी गई है और संबंधित बैंक रिकॉर्ड, ऋण स्वीकृति से जुड़े दस्तावेज तथा अन्य अभिलेखों को खंगाला जा रहा है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कथित ऋण किस आधार पर स्वीकृत किया गया और प्रक्रिया के दौरान किन-किन लोगों की भूमिका रही।

बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि किसी भी ऋण को स्वीकृत करने के लिए ग्राहक की पहचान, आवेदन पत्र, हस्ताक्षर, दस्तावेजी सत्यापन और अन्य निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के नाम पर उसकी जानकारी के बिना ऋण स्वीकृत होने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय चूक मानी जाएगी।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ग्राहकों को नियमित रूप से अपने बैंक खातों, जमा योजनाओं और वित्तीय रिकॉर्ड की निगरानी करते रहना चाहिए। मोबाइल अलर्ट, ईमेल सूचनाएं और समय-समय पर बैंक स्टेटमेंट की जांच कई बार ऐसी गड़बड़ियों का समय रहते पता लगाने में मदद कर सकती है।

फिलहाल जांच एजेंसियां मामले के सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। बैंक से संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड का सत्यापन किया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कथित ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। जांच पूरी होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और इस पूरे प्रकरण में किन लोगों की जिम्मेदारी बनती है। इस बीच मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर बैंकिंग सुरक्षा और ग्राहकों के अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

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