आजमगढ़। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में अर्धसैनिक बलों में भर्ती दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले एक बड़े संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि यह गिरोह पिछले करीब नौ वर्षों से सक्रिय था और पूर्वांचल के कई जिलों के युवाओं को सरकारी नौकरी का झांसा देकर अपने जाल में फंसा चुका था। मामले में अब तक तीन लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि गिरोह का कथित सरगना विद्यासागर और बलिया निवासी मुन्ना शर्मा समेत कई आरोपी अभी भी फरार बताए जा रहे हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह युवाओं को अर्धसैनिक बलों में भर्ती कराने का भरोसा दिलाता था और इसके लिए पूर्वोत्तर राज्यों के फर्जी डोमिसाइल, पहचान पत्र और अन्य दस्तावेज तैयार कराए जाते थे। युवाओं से पहले ₹20 हजार से ₹40 हजार तक लेकर असम के सिलचर, करीमगंज और हाइलाकांडी जैसे जिलों में परीक्षा दिलाने भेजा जाता था। आरोप है कि अभ्यर्थियों को स्थानीय पहचान साबित करने के लिए वहां की तहसील, थाना, पिन कोड और जनप्रतिनिधियों तक की जानकारी याद कराई जाती थी ताकि सत्यापन के दौरान किसी को संदेह न हो।
FCRF Launches Chief AI Officer Certification to Build India’s AI Governance Leaders
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि परीक्षा में सफल होने के बाद गिरोह का नेटवर्क दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कराने के नाम पर ₹6 लाख से ₹8 लाख तक वसूलता था। असम में मौजूद एक व्यक्ति मधु पर फर्जी दस्तावेजों के सत्यापन और अभ्यर्थियों के ठहरने-खाने की व्यवस्था कराने का आरोप है। अधिकारियों का कहना है कि पूरे नेटवर्क को इस तरह तैयार किया गया था कि भर्ती प्रक्रिया वास्तविक लगे और अभ्यर्थियों को किसी तरह का संदेह न हो।
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू नियुक्ति पत्रों की डिलीवरी का तरीका बताया जा रहा है। पीड़ितों के अनुसार गिरोह चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियुक्ति पत्रों को एयर कार्गो या हवाई डाक के जरिए मंगवाता था। दमदम एयरपोर्ट से वाराणसी एयरपोर्ट तक पहुंचे लिफाफों को दिखाकर अभ्यर्थियों और उनके परिवारों को यह भरोसा दिलाया जाता था कि पूरी भर्ती प्रक्रिया वैध और आधिकारिक है। इसी विश्वास में आकर कई परिवारों ने जमीन बेचकर, बैंक से कर्ज लेकर और जेवर गिरवी रखकर आरोपियों को लाखों रुपये दिए।
जांच के दौरान कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां कुछ युवाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कई वर्षों तक नौकरी भी की। बाद में दस्तावेज सत्यापन में फर्जीवाड़ा सामने आने पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। एक पीड़ित ने बताया कि वर्ष 2017 में उसके लिए असम के हाइलाकांडी और सिलचर जिले से फर्जी निवास प्रमाण पत्र तैयार कराया गया था। चयन के बाद उसने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में प्रशिक्षण लिया और झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा बेंगलुरु में लगभग चार वर्षों तक सेवा भी की।
पीड़ित के अनुसार नौकरी हासिल करने के लिए उसके परिवार ने ₹15 लाख से अधिक खर्च किए थे। इसके लिए बैंक से ऋण लिया गया और परिवार की महिलाओं के जेवर तक गिरवी रखने पड़े। बाद में दस्तावेजों की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने पर उसकी सेवा समाप्त कर दी गई। उसने बताया कि नौकरी छूटने के बाद परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहा है तथा ऋण की किस्तें अब भी चुकानी पड़ रही हैं।
एक अन्य पीड़ित ने बताया कि उसने नौकरी लगवाने के लिए लगभग ₹10 लाख दिए थे। वर्ष 2021 में उसे नियुक्ति पत्र मिला, 11 महीने का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उसने मुंबई में करीब एक वर्ष तक सेवा भी की। बाद में सत्यापन के दौरान असम का निवास प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने पर उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई।
मामले की जांच कर रही टीम अब गिरोह के बैंक खातों, आर्थिक लेन-देन और फरार आरोपियों के नेटवर्क की पड़ताल में जुटी है। अधिकारियों के अनुसार पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह आशंका जताई जा रही है कि ठगी का दायरा कई राज्यों तक फैला हो सकता है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि इस तरह के भर्ती रैकेट अब पारंपरिक धोखाधड़ी से आगे बढ़कर संगठित दस्तावेज फर्जीवाड़ा, डिजिटल पहचान हेरफेर और सोशल इंजीनियरिंग के मिश्रण के रूप में काम कर रहे हैं। उनके अनुसार अपराधी युवाओं और उनके परिवारों के सरकारी नौकरी पाने के भावनात्मक दबाव का फायदा उठाते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को केवल आधिकारिक पोर्टल, सरकारी वेबसाइट और सत्यापित दस्तावेजों पर भरोसा करना चाहिए तथा नकद भुगतान या अनौपचारिक माध्यमों से भर्ती कराने के दावों से सतर्क रहना चाहिए।
