अयोध्या। उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में कौशल विकास प्रशिक्षण योजना के नाम पर कथित वित्तीय धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए जारी की गई ₹14.69 लाख से अधिक की सरकारी धनराशि कथित तौर पर हड़प ली गई और प्रशिक्षण संचालित करने वाले कॉलेज को भुगतान नहीं किया गया। मामले में अदालत के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। प्रकरण सामने आने के बाद शिक्षा और प्रशिक्षण योजनाओं से जुड़े फंड के उपयोग पर भी सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, मामला तारुन थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां डायमंड इंटर कॉलेज, रामपुर भगन के प्रधानाचार्य राममूर्ति पटेल ने शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में नरायनपुर निवासी सुधीर कुमार पाण्डेय पर आरोप लगाए गए हैं। प्रधानाचार्य का कहना है कि वर्ष 2022 में आरोपी ने विद्यालय में कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने का प्रस्ताव दिया था और आश्वासन दिया था कि प्रशिक्षण पर होने वाला पूरा खर्च संबंधित विभाग द्वारा जारी किया जाएगा।
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शिकायत के मुताबिक, जनवरी 2022 से जुलाई 2022 के बीच विद्यालय परिसर में कुल आठ बैचों में 163 छात्रों और प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान प्रशिक्षकों, तकनीकी संसाधनों और अन्य व्यवस्थाओं पर करीब ₹11 लाख से अधिक की राशि खर्च हुई। कॉलेज प्रशासन को उम्मीद थी कि विभागीय भुगतान जारी होने के बाद खर्च की प्रतिपूर्ति हो जाएगी।
हालांकि बाद में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी में पता चला कि विभाग ने प्रशिक्षण मद में कुल ₹14,69,412 की राशि 6 मार्च 2023 को ही जारी कर दी थी। आरोप है कि यह रकम सुधीर कुमार पाण्डेय के खाते में पहुंच गई, लेकिन कॉलेज प्रशासन को कोई भुगतान नहीं किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि कई बार मौखिक अनुरोध, नोटिस और रजिस्ट्री भेजने के बावजूद धनराशि वापस नहीं की गई।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब प्रधानाचार्य ने आरोप लगाया कि 22 फरवरी 2026 को तारुन और लालगंज के बीच स्थित एक पुलिया के पास आरोपी ने उन्हें रोक लिया। शिकायत में कहा गया है कि वहां गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने की धमकी दी गई। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों के रूप में प्रशिक्षक विनोद कुमार सिंह और सहायक रामसूरत वर्मा के नाम भी सामने आए हैं।
अधिकारियों के अनुसार, अयोध्या की ACJM द्वितीय अदालत के आदेश पर तारुन थाने में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अब वित्तीय रिकॉर्ड, विभागीय भुगतान दस्तावेज, बैंक खातों और प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या इस प्रकार की कथित अनियमितता अन्य संस्थानों या प्रशिक्षण योजनाओं में भी हुई थी।
मामले से जुड़े जानकारों का कहना है कि कौशल विकास और प्रशिक्षण योजनाओं में फर्जीवाड़े के मामले पिछले कुछ वर्षों में बढ़े हैं। कई मामलों में प्रशिक्षण, रोजगार या सरकारी सहायता के नाम पर फर्जी संस्थाएं और बिचौलिए सरकारी फंड के दुरुपयोग के आरोपों में सामने आए हैं। विशेष रूप से उन योजनाओं में जोखिम अधिक देखा गया है, जहां भुगतान प्रक्रिया डिजिटल रिकॉर्ड और निजी एजेंसियों के माध्यम से संचालित होती है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि सरकारी प्रशिक्षण और स्किल डेवलपमेंट योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए डिजिटल ऑडिट सिस्टम को मजबूत करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि फंड रिलीज, प्रशिक्षण सत्यापन और लाभार्थियों की उपस्थिति को रियल-टाइम डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि फर्जी भुगतान और वित्तीय गड़बड़ियों की शुरुआती स्तर पर पहचान की जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी योजनाओं में धनराशि जारी करने से पहले मल्टी-लेयर सत्यापन और स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। खासतौर पर शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार योजनाओं में लाभार्थियों, संस्थानों और भुगतान रिकॉर्ड का नियमित डिजिटल मिलान बड़े वित्तीय फर्जीवाड़ों को रोकने में मदद कर सकता है।
फिलहाल पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि बैंकिंग ट्रांजैक्शन, विभागीय फाइलों और संबंधित व्यक्तियों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। माना जा रहा है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस कथित वित्तीय गड़बड़ी से जुड़े अन्य पहलुओं का भी खुलासा हो सकता है।
