नई दिल्ली। देश के चर्चित बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों में से एक माने जा रहे अमिटी यूनिवर्सिटी चेक फ्रॉड मामले में जांच एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली है। विश्वविद्यालय के बैंक खाते से कथित तौर पर जाली चेक के जरिए ₹6.25 करोड़ निकालने के मामले में लंबे समय से फरार चल रहे एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपी को कई वर्षों से पुलिस तलाश रही थी और अदालत उसे पहले ही घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) घोषित कर चुकी थी।
मामला वर्ष 2020 में दर्ज किया गया था, जब बैंक अधिकारियों ने विश्वविद्यालय के खाते से संदिग्ध लेनदेन की शिकायत दर्ज कराई थी। जांच के दौरान सामने आया कि अगस्त 2019 में विश्वविद्यालय के नाम से जारी बताए गए तीन चेक बैंकिंग प्रणाली में प्रस्तुत किए गए थे। शुरुआती जांच में इन चेकों को फर्जी और धोखाधड़ी के उद्देश्य से इस्तेमाल किया गया बताया गया।
जांच एजेंसियों के अनुसार, तीन में से दो चेक क्लियर हो गए, जिसके बाद करोड़ों रुपये विभिन्न खातों में स्थानांतरित कर दिए गए। तीसरे चेक का भुगतान समय रहते रोक दिया गया, जिससे अतिरिक्त नुकसान टल गया। हालांकि तब तक विश्वविद्यालय के खाते से ₹6.25 करोड़ की बड़ी रकम निकल चुकी थी।
FCRF Launches Chief AI Officer Certification to Build India’s AI Governance Leaders
मामले की जांच के दौरान बैंक रिकॉर्ड, खाते के विवरण और लेनदेन के दस्तावेजों की गहन पड़ताल की गई। अधिकारियों को पता चला कि लगभग ₹2.5 करोड़ की राशि गुजरात स्थित एक इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म के खाते में जमा कराई गई थी, जबकि करीब ₹2.7 करोड़ मध्य प्रदेश स्थित एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के खाते में पहुंचाए गए थे। जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार आरोपी उस एनजीओ का सचिव और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता था।
आरोप है कि एनजीओ के खाते में रकम पहुंचने के बाद आरोपी ने उसमें से ₹2.07 करोड़ दूसरी कड़ी से जुड़े एक अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर कर दिए। इसके बाद धनराशि को कई अलग-अलग बैंक खातों के जरिए घुमाया गया। जांच एजेंसियों का मानना है कि रकम के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थियों को छिपाने के लिए तथाकथित लेयरिंग तकनीक अपनाई गई।
जांच में दिल्ली की कई संदिग्ध शेल कंपनियों के खातों का भी उल्लेख सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, धोखाधड़ी से प्राप्त धन का एक हिस्सा नकद निकाला गया, जबकि शेष राशि विभिन्न संस्थाओं और खातों में स्थानांतरित की गई। इससे जांचकर्ताओं को आशंका है कि वित्तीय लेनदेन की जटिल श्रृंखला तैयार कर धन के प्रवाह को छिपाने की कोशिश की गई।
इस मामले में इससे पहले तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालांकि गिरफ्तार किया गया आरोपी लंबे समय तक जांच एजेंसियों की पकड़ से दूर रहा। कई राज्यों में तलाश और तकनीकी निगरानी के बाद आखिरकार उसे मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से दबोच लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश कर आगे की पूछताछ और धन के प्रवाह से जुड़े तथ्यों की जांच की जा रही है।
जांच अधिकारियों का मानना है कि यह मामला केवल जाली चेक के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बैंकिंग प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाले लोगों की भूमिका भी हो सकती है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार आरोपी ने बारहवीं तक शिक्षा प्राप्त की थी और पहले चार्टर्ड अकाउंटेंट के कार्यालय में काम कर चुका था। इसी वजह से उसे बैंकिंग और वित्तीय प्रक्रियाओं की पर्याप्त समझ होने की संभावना जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में फर्जी दस्तावेज, बहुस्तरीय बैंक ट्रांजेक्शन और शेल कंपनियों का उपयोग कर धन के स्रोत को छिपाने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों की जांच में डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड, खाता विवरण और फंड ट्रेल सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित होते हैं।
फिलहाल जांच एजेंसियां मामले से जुड़े अन्य संदिग्धों की तलाश कर रही हैं। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय के खाते से निकाली गई पूरी राशि किन-किन खातों और संस्थाओं तक पहुंची तथा इस कथित बैंकिंग धोखाधड़ी नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे। जांच पूरी होने के बाद मामले के वित्तीय तंत्र और धन प्रवाह की पूरी तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।
