प्रयागराज। लगभग ₹82.68 करोड़ के बैंक ऋण से जुड़े चर्चित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्री बसंत ऑयल्स लिमिटेड के पूर्व निदेशकों के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि संबंधित बैंक के साथ पूर्ण और अंतिम समझौता हो जाने तथा सभी बकाया राशि का निपटारा होने के बाद मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
यह फैसला कंपनी के पूर्व निदेशकों गगन अग्रवाल, प्रमोद अग्रवाल और आयुष अग्रवाल के पक्ष में आया है। तीनों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर CBI द्वारा दर्ज मामलों और उनके आधार पर चल रही कार्यवाही को चुनौती दी थी।
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मामले की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी, जब तत्कालीन आंध्रा बैंक, जो अब यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में विलय हो चुका है, ने श्री बसंत ऑयल्स लिमिटेड को एक नई रिफाइनिंग यूनिट स्थापित करने के लिए लगभग ₹82.68 करोड़ की ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं। बाद के वर्षों में ऋण खाते की स्थिति खराब होती गई और नवंबर 2019 में इसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया। इसके बाद जुलाई 2021 में खाते को धोखाधड़ी श्रेणी में वर्गीकृत किया गया।
बैंक की शिकायत के आधार पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने मई 2022 में दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की थीं। शुरुआती जांच में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों के उपयोग और खातों में कथित हेरफेर से संबंधित धाराएं लगाई गई थीं। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधान भी शामिल किए गए थे।
हालांकि जांच के दौरान किसी सरकारी अधिकारी की संलिप्तता का प्रमाण नहीं मिलने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़ी धाराएं हटा दी गईं। इसके बाद CBI ने मुख्य रूप से आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से संबंधित धाराओं के तहत आरोपपत्र दाखिल किया।
सितंबर 2023 में आरोपपत्र दाखिल होने के बाद अक्टूबर 2023 में गाजियाबाद स्थित विशेष CBI अदालत ने मामले का संज्ञान लिया और मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसी दौरान आरोपित पूर्व निदेशकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि बैंक तथा कंपनी के बीच विवाद का समाधान कानूनी रूप से मान्य वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) के माध्यम से हो चुका है।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और कंपनी के बीच हुए समझौते के तहत सभी वित्तीय देनदारियों का निपटारा कर दिया गया था। जून 2024 में बैंक ने देयता मुक्ति प्रमाणपत्र जारी करते हुए पुष्टि की कि बकाया राशि का पूर्ण और अंतिम भुगतान प्राप्त हो चुका है। इसके साथ ही बैंक ने ऋण खाते से जुड़ी सभी गिरवी संपत्तियों और व्यक्तिगत गारंटियों को भी मुक्त कर दिया।
बाद में बैंक ने अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करते हुए स्पष्ट किया कि उसे पूर्व निदेशकों के खिलाफ कोई शेष शिकायत नहीं है। बैंक ने जांच एजेंसियों को भी लिखित रूप से सूचित किया कि विवादित ऋण खाते से जुड़े उसके सभी दावे संतोषजनक रूप से निपटा दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने फरवरी 2024 में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत श्री बसंत ऑयल्स लिमिटेड को भंग करने का आदेश दे दिया था। इससे कंपनी का कानूनी अस्तित्व समाप्त हो गया।
हाईकोर्ट ने मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड, बैंक की ओर से जारी दस्तावेजों, समझौते की शर्तों और समग्र परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अब आपराधिक मुकदमा जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बचता। अदालत ने दोनों एफआईआर, CBI के आरोपपत्र, निचली अदालत के संज्ञान आदेश तथा बाद की पुनरीक्षण कार्यवाहियों को भी रद्द कर दिया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां वित्तीय विवादों का समाधान वैध समझौता प्रक्रिया के माध्यम से हो चुका हो और शिकायतकर्ता पक्ष स्वयं सभी दावों के निपटारे की पुष्टि कर चुका हो। इस निर्णय के साथ ही ₹82.68 करोड़ के ऋण खाते से जुड़े इस बहुचर्चित मामले का कानूनी अध्याय लगभग समाप्त हो गया है।
