नोएडा पुलिस की जांच में कंबोडिया और म्यांमार बॉर्डर से संचालित साइबर नेटवर्क का खुलासा, जिसमें ई-सिम, म्यूल खाते और APK फाइलों का इस्तेमाल हो रहा था।

AI Coding की एक गलती से खुला साइबर फ्रॉड का काला नेटवर्क: 3.45 लाख चोरी हुए क्रेडिट कार्ड डेटा ऑनलाइन लीक

Team The420
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नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित कोडिंग टूल्स का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल अब साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए नई चिंता बनता जा रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय साइबर जांच में खुलासा हुआ है कि चोरी किए गए क्रेडिट कार्ड्स की खरीद-बिक्री और उनकी वैधता जांचने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे एक ऑनलाइन फ्रॉड प्लेटफॉर्म से करीब 3.45 लाख पेमेंट कार्ड्स का संवेदनशील डेटा इंटरनेट पर खुला छोड़ दिया गया। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह पूरी चूक AI जनरेटेड कोड में मौजूद सुरक्षा खामी के कारण हुई, जिसने साइबर अपराधियों के नेटवर्क को ही एक्सपोज कर दिया।

साइबर सुरक्षा रिसर्च टीम Cybernews के अनुसार “Jerry’s Store” नाम का यह प्लेटफॉर्म लंबे समय से चोरी किए गए पेमेंट कार्ड्स को टेस्ट और बेचने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। प्लेटफॉर्म पर मौजूद एक असुरक्षित सर्वर के जरिए कार्ड होल्डर्स के नाम, कार्ड नंबर, CVV, एक्सपायरी डेट और बिलिंग एड्रेस जैसी बेहद संवेदनशील जानकारियां बिना किसी पासवर्ड या ऑथेंटिकेशन के सार्वजनिक रूप से एक्सेस की जा सकती थीं। यह खुलासा अप्रैल 2026 में हुई एक साइबर जांच के दौरान सामने आया, जिसके बाद वैश्विक साइबर सुरक्षा समुदाय में हड़कंप मच गया।

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जांचकर्ताओं ने पाया कि प्लेटफॉर्म के ऑपरेटर्स ने सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटरनल मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार करने के लिए “Cursor” नाम के AI कोडिंग असिस्टेंट का इस्तेमाल किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, अपराधियों ने AI टूल से एक स्टैटिस्टिक्स डैशबोर्ड तैयार करवाया था, लेकिन AI सिस्टम ने ऐसा वेब डायरेक्टरी स्ट्रक्चर जनरेट कर दिया जिसमें कोई पासवर्ड सुरक्षा या ऑथेंटिकेशन लेयर नहीं थी। इसी तकनीकी गलती की वजह से पूरा डेटाबेस इंटरनेट पर खुल गया और हजारों चोरी किए गए कार्ड्स का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से एक्सेस होने लगा।

लीक हुए डेटाबेस में करीब 2 लाख ऐसे कार्ड मिले जिन्हें “इनवैलिड” मार्क किया जा चुका था, जबकि लगभग 1.45 लाख कार्ड अब भी एक्टिव और इस्तेमाल योग्य पाए गए। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि डार्क वेब मार्केट में एक वैध चोरी हुआ क्रेडिट कार्ड औसतन 7 से 18 डॉलर तक में बेचा जाता है। इस हिसाब से लीक हुए डेटा की अवैध बाजार में कीमत लाखों डॉलर तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का डेटा साइबर अपराधियों के लिए बेहद मूल्यवान होता है क्योंकि इसके जरिए ऑनलाइन खरीदारी, फर्जी ट्रांजैक्शन और वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया जा सकता है।

जांच में यह भी सामने आया कि साइबर अपराधी चोरी किए गए कार्ड्स की वैधता जांचने के लिए लोकप्रिय ई-कॉमर्स और ऑनलाइन सर्विस प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, Amazon, Grubhub, Temu, Lyft और Sam’s Club जैसी वैध वेबसाइटों पर छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन करके कार्ड्स को टेस्ट किया जाता था। यदि भुगतान सफल हो जाता था, तो कार्ड को “वैध” घोषित कर डार्क वेब नेटवर्क में ऊंची कीमत पर बेच दिया जाता था। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के छोटे ट्रांजैक्शन अक्सर सामान्य ऑनलाइन भुगतान की भीड़ में छिप जाते हैं, जिससे बैंकों और पेमेंट कंपनियों के लिए उन्हें तुरंत पकड़ पाना मुश्किल हो जाता है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि AI आधारित ऑटोमेशन अब साइबर अपराधियों के लिए नया हथियार बन चुका है। उन्होंने कहा,

“पहले इस तरह के साइबर नेटवर्क बनाने के लिए अनुभवी हैकर्स और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब AI टूल्स ने साइबर अपराध की बाधाएं कम कर दी हैं। बिना पर्याप्त तकनीकी ज्ञान वाले लोग भी AI की मदद से बड़े स्तर पर फर्जी प्लेटफॉर्म और फ्रॉड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर पा रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब AI जनरेटेड कोड को बिना सिक्योरिटी ऑडिट के सीधे लाइव सर्वर पर इस्तेमाल किया जाता है।”

तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि AI कोडिंग टूल्स सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट को तेज जरूर बनाते हैं, लेकिन मानवीय निगरानी और सिक्योरिटी टेस्टिंग की कमी गंभीर खतरे पैदा कर सकती है। हाल के कई शोधों में भी यह सामने आया है कि AI जनरेटेड कोड में गलत परमिशन सेटिंग, डेटा एक्सपोजर और सिक्योरिटी कमजोरियां आम तौर पर पाई जाती हैं।

विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि वे अपने बैंक खातों और कार्ड स्टेटमेंट्स की नियमित निगरानी करें, SMS और ईमेल ट्रांजैक्शन अलर्ट हमेशा सक्रिय रखें तथा किसी भी संदिग्ध गतिविधि की स्थिति में तुरंत कार्ड ब्लॉक करवाएं। साथ ही कंपनियों और डेवलपर्स को चेतावनी दी गई है कि AI आधारित कोडिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते समय हर स्तर पर सिक्योरिटी ऑडिट, पेनिट्रेशन टेस्टिंग और मैनुअल वेरिफिकेशन अनिवार्य किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के बड़े डेटा लीक और वित्तीय साइबर अपराधों को रोका जा सके।

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