आजमगढ़ साइबर ठगी मामले में आरोपी को बिहार से गिरफ्तार किया गया, जिसने कथित रूप से पेट्रोल पंप और जन सेवा केंद्रों के जरिए ठगी की रकम नकद कराई।

₹1.56 करोड़ का डिजिटल घोटाला: ई-प्रोक्योरमेंट कंपनी में अंदरूनी कर्मचारियों ने सिस्टम से छेड़छाड़ कर बदले बैंक डिटेल, एस्क्रो से उड़ाई रकम

Team The420
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अहमदाबाद। शहर की एक ई-प्रोक्योरमेंट टेक्नोलॉजी कंपनी में डिजिटल सिस्टम का दुरुपयोग कर करीब ₹1.56 करोड़ की बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि कंपनी के ही दो कर्मचारियों ने प्रशासनिक पहुंच का गलत इस्तेमाल करते हुए बिडर अकाउंट डिटेल्स में बदलाव किया और एस्क्रो खातों से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था को दरकिनार कर धनराशि को निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया। यह पूरा मामला कॉरपोरेट डिजिटल सुरक्षा और अंदरूनी नियंत्रण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

यह मामला Ellisbridge स्थित E-Procurement Technologies Limited से जुड़ा है, जो ई-ऑक्शन और ई-टेंडरिंग सेवाएं प्रदान करती है। कंपनी में बिडिंग प्रक्रिया के दौरान जमा होने वाली सुरक्षा राशि एस्क्रो खातों में रखी जाती है, जिसे प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित बिडर्स को वापस किया जाता है। इसी मजबूत माने जाने वाले सिस्टम में सेंध लगाकर आरोपियों ने वित्तीय हेराफेरी को अंजाम दिया और लंबे समय तक इसे छिपाए रखा।

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कंपनी की फाइनेंस हेड ध्वनि दीपकभाई व्रजलाल कमानी ने शिकायत दर्ज कराई है कि कर्मचारियों धर्म हरिशभाई राठौड़ और निखिल राजेशभाई खलास ने अपने अधिकृत एक्सेस का दुरुपयोग किया। आरोप है कि दोनों ने डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) फाइलों में अनधिकृत बदलाव किए, बिडर अकाउंट्स के पासवर्ड रीसेट किए और बैंक डिटेल्स को बदलकर ट्रांजैक्शन अपने नियंत्रण वाले खातों की ओर मोड़ दिए। इस प्रक्रिया में सिस्टम की सुरक्षा परतों को जानबूझकर कमजोर किया गया।

जांच में सामने आया है कि निखिल खलास के SBI खाते में करीब ₹16 लाख ट्रांसफर किए गए, जबकि उनकी पत्नी प्रियंका खलास के बैंक ऑफ बड़ौदा खाते में लगभग ₹1.40 करोड़ की बड़ी राशि जमा की गई। कुल मिलाकर ₹1.56 करोड़ की हेराफेरी का अनुमान लगाया गया है। यह पूरा वित्तीय खेल जनवरी 2021 से अप्रैल 2026 के बीच अलग-अलग चरणों में चलता रहा, जिससे शुरुआती स्तर पर इसका पता लगाना मुश्किल हो गया।

रिपोर्ट के अनुसार, आरोपियों ने कई बिडर अकाउंट्स में लॉगिन कर मूल बैंक विवरण हटा दिए और नए बैंक खाते जोड़ दिए। इसके बाद एस्क्रो सिस्टम से जुड़े रिफंड ट्रांजैक्शन को डायवर्ट किया गया। डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट के दुरुपयोग ने इस पूरी प्रक्रिया को और जटिल बना दिया, जिससे सामान्य ऑडिट में भी गड़बड़ी पकड़ में नहीं आ सकी।

आंतरिक ऑडिट और डिजिटल फॉरेंसिक जांच के बाद कंपनी को इस गड़बड़ी का पता चला। सिस्टम लॉग्स में अनधिकृत लॉगिन, संदिग्ध बदलाव और डेटा मैनिपुलेशन के स्पष्ट संकेत मिले, जिसके बाद विस्तृत जांच शुरू की गई। इसके आधार पर संबंधित कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

जांच एजेंसियां अब डिजिटल साक्ष्य, बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड और सर्वर लॉग्स की गहन जांच कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन लोग शामिल हो सकते हैं। आशंका है कि यह मामला केवल दो कर्मचारियों तक सीमित नहीं है और इसके पीछे कोई बड़ा साइबर-फ्रॉड पैटर्न भी हो सकता है।

यह घटना एक बार फिर दर्शाती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित वित्तीय सिस्टम में मजबूत एक्सेस कंट्रोल, मल्टी-लेयर ऑथेंटिकेशन और लगातार मॉनिटरिंग कितनी जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे ई-गवर्नेंस और डिजिटल टेंडरिंग सिस्टम बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे अंदरूनी साइबर जोखिम भी गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

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