आगरा। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में बैंकिंग सेक्टर से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय धोखाधड़ी मामला सामने आया है, जहां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) से बर्तन कारोबार के नाम पर करीब ₹1.30 करोड़ का लोन लेकर कथित तौर पर सुनियोजित तरीके से बैंक को चूना लगाया गया। जांच में खुलासा हुआ कि जिस संपत्ति को बैंक के पास गारंटी के तौर पर गिरवी रखा गया था, वह पहले से कई अन्य बैंकों में भी वित्तीय भार के तहत थी। इतना ही नहीं, जिस कारोबार के आधार पर लोन स्वीकृत कराया गया, उसका वास्तविक स्टॉक भी जांच में “शून्य” पाया गया। मामले में फर्म संचालक समेत छह लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है।
मामला तब सामने आया जब एसबीआई प्रबंधन ने संदिग्ध लोन खाते की आंतरिक जांच शुरू कराई। बैंक अधिकारियों को शुरुआत में ही खाते के संचालन और भुगतान पैटर्न में अनियमितताओं की आशंका हुई थी। इसके बाद जब फर्म के कारोबार, स्टॉक और गिरवी रखी गई संपत्ति का भौतिक सत्यापन कराया गया तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पाया गया कि जिस बर्तन कारोबार को सक्रिय और लाभकारी बताकर करोड़ों का लोन लिया गया था, उसका वास्तविक स्टॉक मौके पर मौजूद ही नहीं था।
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इसके अलावा, बैंक के पास सुरक्षा के रूप में रखी गई संपत्ति को लेकर भी बड़ा खुलासा हुआ। जांच एजेंसियों को पता चला कि उसी संपत्ति पर पहले से केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और इलाहाबाद बैंक का भी वित्तीय दावा था। यानी एक ही संपत्ति को अलग-अलग बैंकों में गिरवी रखकर कई जगह से लोन लिया गया। बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार, यह तरीका संगठित बैंकिंग फ्रॉड के मामलों में अक्सर इस्तेमाल किया जाता है, जहां फर्जी या छिपाई गई जानकारी के जरिए विभिन्न वित्तीय संस्थानों को गुमराह किया जाता है।
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि जिस संपत्ति को एसबीआई के सामने वैध सुरक्षा के तौर पर प्रस्तुत किया गया था, उसे केनरा बैंक पहले ही नीलाम कर चुका था। यानी बैंक को ऐसी संपत्ति के आधार पर ऋण दिया गया, जिस पर पहले से कानूनी और वित्तीय कार्रवाई हो चुकी थी। इससे दस्तावेजों की वैधता और बैंकिंग प्रक्रिया में इस्तेमाल की गई जानकारी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच के दौरान यह भी पता चला कि संबंधित लोन खाता दो बार एनपीए यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट घोषित हो चुका था। इसके बावजूद कथित तौर पर फर्म ने दस्तावेजों और कारोबारी गतिविधियों को वैध दिखाकर वित्तीय लाभ हासिल किया। सरकारी रिकॉर्ड की जांच में फर्म का जीएसटी नंबर भी कैंसिल पाया गया, जिससे कारोबार की वास्तविक स्थिति पर और संदेह गहरा गया।
बैंक अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों ने लोन राशि का इस्तेमाल व्यापार विस्तार में करने के बजाय कथित तौर पर उसका बड़ा हिस्सा निजी खातों में ट्रांसफर कर लिया। जांच में करीब ₹30 लाख की रकम सीधे निजी बैंक खातों में स्थानांतरित किए जाने की बात सामने आई है। इसे फंड डायवर्जन और वित्तीय हेराफेरी का मामला माना जा रहा है।
मामले के उजागर होने के बाद बैंक प्रबंधन ने पुलिस से शिकायत कर कानूनी कार्रवाई की मांग की। इसके बाद थाना हरीपर्वत में मुख्य फर्म संचालक और उसके सहयोगियों समेत कुल छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। जांच एजेंसियां अब बैंकिंग ट्रांजैक्शन, संपत्ति रिकॉर्ड, गिरवी दस्तावेजों और संबंधित कंपनियों के वित्तीय लेनदेन की विस्तृत पड़ताल कर रही हैं।
वित्तीय अपराध मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर फर्जी मूल्यांकन रिपोर्ट, जाली संपत्ति दस्तावेज और कई संस्थानों में एक ही एसेट को गिरवी रखकर वित्तीय धोखाधड़ी की जाती है। उनका मानना है कि बैंकों को लोन स्वीकृति से पहले डिजिटल रिकॉर्ड सत्यापन, संपत्ति की स्वतंत्र कानूनी जांच और जीएसटी तथा कारोबारी गतिविधियों का वास्तविक ऑडिट अनिवार्य रूप से कराना चाहिए।
फिलहाल पुलिस और आर्थिक अपराध से जुड़ी एजेंसियां यह जांच कर रही हैं कि क्या यह मामला किसी बड़े संगठित बैंकिंग फ्रॉड नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। माना जा रहा है कि जांच आगे बढ़ने पर कई और वित्तीय लेनदेन और संदिग्ध दस्तावेज सामने आ सकते हैं। बैंकिंग सेक्टर में इस मामले को एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, जिसने लोन सत्यापन और जोखिम प्रबंधन प्रक्रियाओं पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
