गुरुग्राम। हरियाणा के गुरुग्राम में साइबर अपराध से जुड़े एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने का झांसा देकर लोगों को निशाना बना रहा था। जांच में सामने आया है कि आरोपित एक फर्जी कॉल सेंटर संचालित कर रहे थे और बैंक या वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधि बनकर कार्डधारकों से संपर्क करते थे। इसके बाद उन्हें एक लिंक भेजा जाता था, जिसके जरिए उनकी वित्तीय जानकारी तक पहुंच बनाकर ऑनलाइन ठगी को अंजाम दिया जाता था। मामले में एक महिला सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड की तलाश जारी है।
मामले की शुरुआत मार्च 2026 में दर्ज एक शिकायत से हुई। पीड़ित ने आरोप लगाया कि उसे फोन कर बताया गया कि उसके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाई जा सकती है। बातचीत के दौरान उसे एक लिंक भेजा गया और प्रक्रिया पूरी करने के लिए उस पर क्लिक करने को कहा गया। जैसे ही उसने लिंक खोला, उसके क्रेडिट कार्ड से लगभग ₹28,000 की राशि निकल गई। घटना के बाद पीड़ित ने साइबर अपराध थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर जांच शुरू की गई।
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जांच के दौरान साइबर विशेषज्ञों और तकनीकी टीमों ने कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रेल, बैंकिंग गतिविधियों और संदिग्ध मोबाइल नंबरों का विश्लेषण किया। इसके आधार पर पुलिस को दिल्ली में संचालित एक संदिग्ध कॉल सेंटर की जानकारी मिली। कई दिनों तक निगरानी और तकनीकी विश्लेषण के बाद विभिन्न स्थानों पर छापेमारी की गई, जहां से महिला समेत पांच आरोपितों को हिरासत में लिया गया।
प्रारंभिक पूछताछ में सामने आया कि गिरफ्तार आरोपित टेलीकॉलर के रूप में काम करते थे। उन्हें संभावित शिकारों के मोबाइल नंबर और अन्य जानकारी उपलब्ध कराई जाती थी। इसके बाद वे लोगों को फोन कर क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने, विशेष ऑफर दिलाने या बैंकिंग सुविधाओं को अपग्रेड करने का लालच देते थे। जब कोई व्यक्ति उनकी बातों में आ जाता था, तब उसे एक फर्जी लिंक भेजा जाता था।
जांच एजेंसियों के अनुसार लिंक पर क्लिक करने के बाद पीड़ितों के कार्ड संबंधी विवरण और अन्य आवश्यक जानकारियां अपराधियों तक पहुंच जाती थीं। इसके बाद गिरोह के सदस्य उन्हीं कार्डों का उपयोग कर ऑनलाइन महंगे उत्पाद खरीदते थे। खरीदे गए सामान को बाद में नकदी में बदल दिया जाता था, जिससे ठगी की रकम को ट्रैक करना कठिन हो जाता था।
पूछताछ में यह भी पता चला कि गिरोह लगातार अपना ठिकाना बदलता रहता था। साइबर निगरानी और लोकेशन ट्रैकिंग से बचने के लिए कथित तौर पर हर 10 से 15 दिन में कॉल सेंटर का संचालन नए स्थान से शुरू कर दिया जाता था। जांचकर्ताओं का मानना है कि यह रणनीति लंबे समय तक कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने के उद्देश्य से अपनाई गई थी।
अधिकारियों को संदेह है कि गिरफ्तार किए गए लोग नेटवर्क का केवल एक हिस्सा हैं और पूरे गिरोह का संचालन किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जा रहा था। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में कितने लोग इस धोखाधड़ी का शिकार बने और कुल कितनी राशि की ठगी की गई। डिजिटल उपकरणों, मोबाइल फोन, सिम कार्ड, बैंक खातों और ऑनलाइन खरीदारी के रिकॉर्ड की गहन जांच की जा रही है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि इस तरह के अधिकांश साइबर गिरोह सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों का सहारा लेते हैं। अपराधी खुद को बैंक, क्रेडिट कार्ड कंपनी या वित्तीय संस्था का प्रतिनिधि बताकर लोगों का विश्वास जीतते हैं और फिर उन्हें फर्जी लिंक पर क्लिक करने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी बैंक या अधिकृत वित्तीय संस्था द्वारा फोन पर लिंक भेजकर क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने जैसी प्रक्रिया पूरी नहीं कराई जाती। लोगों को ऐसे कॉल, लिंक और संदेशों से सतर्क रहना चाहिए तथा किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत साइबर हेल्पलाइन या पुलिस को सूचना देनी चाहिए।
पुलिस अब गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है। जांच एजेंसियां डिजिटल साक्ष्यों, वित्तीय लेन-देन और ऑनलाइन खरीदारी के रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि आगे की जांच में इस साइबर ठगी गिरोह के संचालन, वित्तीय प्रवाह और संभावित पीड़ितों की वास्तविक संख्या से जुड़े महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं।
