पुणे। देश के प्रमुख आईटी हब में से एक हिंजवडी से सामने आए एक मामले ने निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की सुरक्षा और कॉर्पोरेट जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां संचालित एक टेक्नोलॉजी कंपनी के अचानक बंद हो जाने से 700 से अधिक कर्मचारी और इंटर्न एक झटके में बेरोजगार हो गए। कर्मचारियों की शिकायतों के आधार पर कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को कथित धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों में गिरफ्तार किया गया है, जबकि कंपनी के अन्य प्रबंधन अधिकारियों के खिलाफ भी जांच शुरू कर दी गई है।
मामला उस समय सुर्खियों में आया जब बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि कंपनी ने बिना किसी पूर्व सूचना के अपने संचालन बंद कर दिए। कर्मचारियों का दावा है कि कई महीनों से वेतन और स्टाइपेंड का भुगतान लंबित था, लेकिन प्रबंधन लगातार आश्वासन देता रहा कि जल्द ही सभी बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। इसके बावजूद न तो भुगतान हुआ और न ही कर्मचारियों को कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति की जानकारी दी गई।
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शिकायतकर्ताओं के अनुसार, कंपनी ने वर्ष 2025 के दौरान बड़े पैमाने पर भर्ती अभियान चलाया था। सॉफ्टवेयर इंजीनियर, फ्रेशर और इंटर्न्स को आकर्षक करियर अवसरों और पेशेवर विकास के वादों के साथ नियुक्त किया गया। शुरुआती महीनों में वेतन और स्टाइपेंड समय पर मिलने से कर्मचारियों का भरोसा मजबूत हुआ, लेकिन बाद में भुगतान में लगातार देरी शुरू हो गई।
पूर्व कर्मचारियों का आरोप है कि जनवरी से ही वेतन भुगतान अनियमित हो गया था। प्रबंधन की ओर से कभी फंडिंग में देरी, कभी आंतरिक ऑडिट और कभी प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया जाता रहा। कर्मचारियों का कहना है कि वे लगातार अपने बकाये की मांग करते रहे, लेकिन हर बार उन्हें जल्द भुगतान का भरोसा देकर टाल दिया गया।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कई कर्मचारी नियमित कार्यदिवस पर कार्यालय पहुंचे और वहां ताला लगा मिला। कर्मचारियों का आरोप है कि संचालन बंद करने से पहले कंपनी ने कोई आधिकारिक सूचना जारी नहीं की। इसके बाद कर्मचारियों ने वरिष्ठ प्रबंधन और कंपनी प्रतिनिधियों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन अधिकांश प्रयास विफल रहे। इससे कर्मचारियों के बीच भ्रम और चिंता का माहौल पैदा हो गया।
मामले में एक और गंभीर आरोप सुरक्षा जमा राशि को लेकर सामने आया है। कर्मचारियों और इंटर्न्स का दावा है कि ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया या उपकरण उपलब्ध कराने के नाम पर उनसे लगभग ₹15,000 तक की सुरक्षा राशि ली गई थी। कई लोगों का कहना है कि यह रकम अब तक वापस नहीं की गई है। कुछ इंटर्न्स ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें प्रशिक्षण अवधि का स्टाइपेंड नहीं मिला और जिन संसाधनों का वादा किया गया था, वे भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
कई कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि वेतन भुगतान में देरी और वित्तीय संकट की आशंकाओं के बावजूद कंपनी नए लोगों की भर्ती जारी रखे हुए थी। शिकायतकर्ताओं का मानना है कि कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति कर्मचारियों से छिपाई गई। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
प्रभावित कर्मचारियों ने अप्रैल में शिकायत दर्ज कराते हुए प्रशासन और श्रम विभाग से हस्तक्षेप की मांग की थी। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई। अब जांच एजेंसियां कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड, कारोबारी लेन-देन, वेतन भुगतान संबंधी दस्तावेज और कर्मचारियों से ली गई जमा राशि की पड़ताल कर रही हैं। यह भी जांच की जा रही है कि क्या कर्मचारियों को नौकरी, वेतन और अन्य वित्तीय दायित्वों के संबंध में गुमराह किया गया था।
इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कई लोगों ने निजी क्षेत्र में कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा, स्टार्टअप और आईटी कंपनियों की वित्तीय पारदर्शिता तथा भर्ती प्रक्रियाओं में जवाबदेही बढ़ाने की मांग उठाई है। यदि आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह हाल के वर्षों में आईटी क्षेत्र से जुड़ा सबसे बड़ा कर्मचारी हित विवाद माना जा सकता है, जिसने सैकड़ों युवाओं के करियर और आर्थिक भविष्य को प्रभावित किया है।
