नई दिल्ली। बहुचर्चित कोयला ब्लॉक आवंटन मामलों में से एक में दिल्ली की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए Hindalco Industries और उसके दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को आपराधिक कार्यवाही से मुक्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सकी और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का मामला बनता हो।
यह मामला ओडिशा के तालाबीरा-I कोयला ब्लॉक से जुड़ा था, जिसके आवंटन और बाद में कोयले के उपयोग को लेकर वर्ष 2015 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप था कि कंपनी ने आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करते हुए कोयले का उपयोग उस उद्देश्य से अलग किया जिसके लिए ब्लॉक आवंटित किया गया था।
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विशेष अदालत ने 30 मई को पारित आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि कंपनी या उसके अधिकारियों ने किसी अवैध कार्य को अंजाम दिया। अदालत के अनुसार, जब किसी अवैध कृत्य का ही प्रमाण नहीं है, तब आपराधिक साजिश का आरोप भी स्वतः कमजोर हो जाता है।
मामले की जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया था कि वर्ष 1994 में जारी आवंटन पत्र के अनुसार तालाबीरा-I कोयला ब्लॉक से निकाला गया कोयला केवल प्रस्तावित विस्तार परियोजना के लिए इस्तेमाल किया जाना था। हालांकि बाद में कंपनी ने इस कोयले का उपयोग हिराकुंड स्थित अपने पावर प्लांट में किया। इसी आधार पर आपराधिक विश्वासघात और धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आदेश में कहा गया कि जिस शर्त का हवाला दिया जा रहा है, वह बाद में निष्पादित खनन पट्टा (माइनिंग लीज) दस्तावेज में शामिल ही नहीं थी। अदालत के अनुसार, 1994 का आवंटन पत्र केवल सरकार की मंशा का संकेत था, न कि ऐसा अंतिम और बाध्यकारी अनुबंध जिससे कंपनी को तत्काल कोई कानूनी अधिकार प्राप्त हो गया हो।
फैसले में कहा गया कि वास्तविक कानूनी अधिकार और दायित्व वर्ष 2003 में खनन पट्टा निष्पादित होने के बाद अस्तित्व में आए। इसलिए केवल आवंटन पत्र के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि कंपनी को ऐसी संपत्ति सौंपी गई थी जिसके दुरुपयोग पर आपराधिक विश्वासघात का मामला बन सके।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आरोप नहीं है कि कंपनी ने खनन पट्टा समझौते की किसी शर्त का उल्लंघन किया हो। न्यायालय ने कहा कि नीतिगत निर्णयों या प्रशासनिक प्रक्रियाओं को वर्षों बाद आपराधिक रंग देना उचित नहीं माना जा सकता, जब तक कि दुर्भावना या आपराधिक मंशा का स्पष्ट प्रमाण मौजूद न हो।
जांच एजेंसी ने यह आरोप भी लगाया था कि वर्ष 2006 में कोयला मंत्रालय को भेजे गए एक पत्र में कंपनी की ओर से भ्रामक जानकारी दी गई थी। कथित तौर पर कहा गया था कि सभी आवश्यक मंजूरियां प्राप्त होने के बाद खनन कार्य शुरू कर दिया गया है। अदालत ने इस आरोप को भी खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि इस कथित जानकारी के आधार पर किसी सरकारी विभाग को गुमराह किया गया या उसने ऐसा कोई निर्णय लिया जो अन्यथा नहीं लिया जाता।
इसी तरह संशोधित खनन योजना को मंजूरी दिलाने के लिए मंत्रालय को कथित रूप से गलत जानकारी देने के आरोपों को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह नहीं लगता कि केवल उस कथित जानकारी के आधार पर योजना को मंजूरी दी गई थी। इसलिए धोखाधड़ी या छलपूर्वक लाभ प्राप्त करने का तत्व भी स्थापित नहीं होता।
फैसले के बाद यह मामला Hindalco के लिए बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है। लगभग एक दशक से अधिक समय तक चले इस विवाद में अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रथमदृष्टया साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसके साथ ही कंपनी और उसके दो पूर्व अधिकारियों के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जहां नीतिगत या प्रशासनिक निर्णयों को बाद में आपराधिक जांच के दायरे में लाया जाता है। फिलहाल मामले में अदालत के आदेश के बाद आगे की कानूनी रणनीति पर संबंधित पक्षों की नजर बनी हुई है।
