युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के प्रभाव से जुड़े केंटकी स्कूल केस में मेटा, टिकटॉक, स्नैपचैट और यूट्यूब ने ₹224 करोड़ में समझौता किया।

डिजिटल दुनिया पर सवाल: सोशल मीडिया कंपनियों ने 2.7 करोड़ डॉलर (करीब ₹224 करोड़) में निपटाया स्कूल केस

Team The420
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केंटकी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चल रहा एक बड़ा कानूनी विवाद उस समय समाप्त हो गया जब चार प्रमुख टेक कंपनियों ने मिलकर लगभग 2.7 करोड़ डॉलर (करीब ₹224 करोड़) में एक स्कूल द्वारा दायर मुकदमे का निपटारा कर दिया। इस समझौते में मेटा, बाइटडांस (टिकटॉक की मूल कंपनी), स्नैपचैट और अल्फाबेट की यूट्यूब शामिल हैं।

यह मामला अमेरिका के केंटकी राज्य के एक स्कूल द्वारा दायर किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि इन कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया है कि युवा उपयोगकर्ता अधिक समय तक ऐप्स पर जुड़े रहें। दावा किया गया था कि यह “एंगेजमेंट-ड्रिवन डिजाइन” छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रहा है, जिसमें चिंता, अवसाद और कुछ मामलों में आत्म-हानि की प्रवृत्ति तक शामिल है।

स्कूल प्रशासन का कहना था कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म उपयोगकर्ताओं को लगातार स्क्रॉल करने और कंटेंट से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे डिजिटल लत जैसी स्थिति बनती है। इसी वजह से छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

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समझौते के तहत कंपनियों ने किसी भी प्रकार की गलती या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। साथ ही, इस सेटलमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन, एल्गोरिद्म या संचालन में कोई बदलाव करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। यानी मामला केवल आर्थिक भुगतान के जरिए समाप्त किया गया है, लेकिन नीति स्तर पर कोई बड़ा सुधार अनिवार्य नहीं हुआ है।

वित्तीय विवरण के अनुसार कुल 2.7 करोड़ डॉलर (करीब ₹224 करोड़) की राशि में सबसे बड़ा हिस्सा मेटा को देना होगा, जो लगभग 90 लाख डॉलर (करीब ₹75 करोड़) है। वहीं स्नैपचैट और बाइटडांस (टिकटॉक) ने 80-80 लाख डॉलर (करीब ₹66-66 करोड़) का भुगतान करने पर सहमति जताई है। अल्फाबेट की यूट्यूब इस समझौते के तहत 20 लाख डॉलर (करीब ₹16.5 करोड़) का भुगतान करेगी।

इस केस ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और उनके एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट वितरण प्रणाली पर बहस को तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे युवाओं के व्यवहार, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक आदतों को भी गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।

हालांकि कंपनियों का कहना है कि वे लगातार सेफ्टी फीचर्स, पेरेंटल कंट्रोल और कंटेंट मॉडरेशन जैसे उपायों को मजबूत कर रही हैं, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि प्लेटफॉर्म्स का मूल डिजाइन ही अधिक स्क्रीन टाइम को बढ़ावा देता है।

इसी बीच मेटा के खिलाफ यूरोपीय संघ (EU) में प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं को लेकर चल रही जांच ने टेक कंपनियों पर नियामक दबाव और बढ़ा दिया है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली पर और सख्त निगरानी देखने को मिल सकती है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया भर में डिजिटल लत, स्क्रीन टाइम और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि टेक कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म्स को अधिक जिम्मेदार और सुरक्षित बनाएं।

कुल मिलाकर यह मामला केवल एक कानूनी समझौता नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में तकनीक और समाज के बीच बढ़ते तनाव का प्रतीक बन गया है। एक तरफ जहां यह तकनीक लोगों को जोड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ इसके दुष्प्रभावों को लेकर वैश्विक बहस भी लगातार तेज होती जा रही है।

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