वाराणसी। मल्टीलेवल मार्केटिंग और नेटवर्किंग के नाम पर बिहार, झारखंड तथा मध्य प्रदेश के करीब 2,000 बेरोजगार युवाओं से लगभग ₹4 करोड़ की कथित ठगी के मामले में जांच अब और तेज हो गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच साइबर क्राइम इकाई को सौंप दी गई है, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) समेत विभिन्न कानूनी और तकनीकी पहलुओं की पड़ताल कर रही है। जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के डिजिटल ट्रेल, वित्तीय लेन-देन और इससे जुड़े लोगों की भूमिका को खंगाल रही हैं।
जांच के केंद्र में आजमगढ़ के मेंहनगर क्षेत्र का निवासी इंद्रजीत कुमार है, जिसे इस कथित नेटवर्क का मुख्य संचालक बताया जा रहा है। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस की एक टीम आजमगढ़ में लगातार सक्रिय है और संभावित ठिकानों पर नजर रखी जा रही है। इसके साथ ही उसके परिजनों, रिश्तेदारों और करीबी सहयोगियों के बैंक खातों, संपत्तियों और आर्थिक गतिविधियों की भी जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ठगी से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल कहां और किस प्रकार किया गया।
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प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि बेरोजगार युवाओं को अधिक आय, आर्थिक स्वतंत्रता और बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर इस नेटवर्क से जोड़ा जाता था। युवाओं को बताया जाता था कि कंपनी से जुड़ने के बाद वे कम समय में अच्छी कमाई कर सकते हैं। इसके लिए उनसे ₹20,000 से ₹30,000 तक की राशि ली जाती थी, जिसे प्रशिक्षण और सदस्यता शुल्क का नाम दिया जाता था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, युवाओं को केवल एक घंटे का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस दौरान उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य उत्पादों की बिक्री का तरीका समझाया जाता था और घर-घर जाकर उत्पाद बेचने के लिए कहा जाता था। साथ ही उन पर नए सदस्यों को जोड़ने का भी दबाव बनाया जाता था। जितने अधिक लोग नेटवर्क में शामिल होते, उतनी ही अधिक कमाई का दावा किया जाता था। यही मॉडल इस कथित नेटवर्क की मुख्य कार्यप्रणाली बताया जा रहा है।
पुलिस का मानना है कि नेटवर्क का संचालन बेहद सुनियोजित तरीके से किया गया। अधिकांश पीड़ित बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से थे, जिसके कारण उनके लिए स्थानीय स्तर पर शिकायत दर्ज कराना आसान नहीं था। इसी स्थिति का फायदा उठाकर आरोपियों ने लंबे समय तक गतिविधियां जारी रखीं। जांच में यह भी सामने आया है कि अधिकतर लेन-देन नकद में किए जाते थे, जिससे बैंकिंग रिकॉर्ड कम से कम बने और जांच एजेंसियों के लिए धन के प्रवाह का पता लगाना कठिन हो।
मामले का खुलासा 20 मई को हुआ, जब सारनाथ क्षेत्र में दो अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी की गई। कार्रवाई के दौरान करीब 250 युवाओं को वहां से बाहर निकाला गया। पूछताछ में पता चला कि उन्हें रोजगार और अधिक कमाई का भरोसा देकर नेटवर्क से जोड़ा गया था। इस मामले में पहले ही छह आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि मुख्य आरोपी इंद्रजीत कुमार अभी भी फरार बताया जा रहा है।
जांचकर्ता अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया अकाउंट, डिजिटल संचार, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विश्लेषण कर रहे हैं। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि नेटवर्क किन-किन जिलों और राज्यों तक फैला हुआ था तथा इसमें और कौन-कौन लोग शामिल थे।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh का कहना है कि साइबर और नेटवर्किंग आधारित ठगी के मामलों में अपराधी युवाओं की बेरोजगारी और जल्दी सफलता पाने की मानसिकता का फायदा उठाते हैं। उनके अनुसार ऐसे नेटवर्क अक्सर वैध व्यवसाय का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं, लेकिन वास्तविक उद्देश्य नए सदस्यों से धन जुटाना होता है। उन्होंने युवाओं को किसी भी निवेश, प्रशिक्षण या रोजगार योजना में शामिल होने से पहले उसकी वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच करने की सलाह दी।
फिलहाल साइबर क्राइम टीम पूरे मामले की गहन जांच कर रही है। अधिकारियों को उम्मीद है कि बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य और गिरफ्तार आरोपियों से मिली जानकारी के आधार पर जल्द ही नेटवर्क की पूरी संरचना सामने आएगी और फरार मुख्य आरोपी सहित अन्य सहयोगियों की भूमिका भी स्पष्ट हो सकेगी।
