नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को निर्देश दिया है कि वह एक विधवा महिला की पेंशन से काटी गई ₹3 लाख से अधिक की राशि ब्याज सहित वापस करे। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला किसी प्रकार की धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने का नहीं, बल्कि बैंक और पेंशन प्रोसेसिंग सिस्टम की त्रुटि का है। ऐसे में रिकवरी का पूरा बोझ पेंशनभोगी पर नहीं डाला जा सकता।
मामला एक पारिवारिक पेंशन से जुड़ा है, जिसमें महिला के दिवंगत पति सरकारी कर्मचारी थे और वर्ष 2003 में सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था। इसके बाद महिला को परिवारिक पेंशन स्वीकृत की गई थी, जिसका भुगतान SBI की शाखा के माध्यम से किया जा रहा था। कई वर्षों तक नियमित रूप से पेंशन मिलने के बाद अचानक महिला की मासिक पेंशन में भारी कटौती शुरू कर दी गई।
महिला को बाद में बताया गया कि पेंशन रिकॉर्ड में बढ़ोतरी की तारीख गलत दर्ज हो जाने के कारण उसे कथित तौर पर अधिक राशि का भुगतान हो गया था। शुरुआत में यह अतिरिक्त भुगतान करीब ₹2.5 लाख बताया गया, लेकिन बाद में बैंक ने पुनर्गणना करते हुए इसे लगभग ₹3.6 लाख तक पहुंचा दिया। इसके बाद बैंक ने बिना विस्तृत पूर्व सूचना दिए महिला की मासिक पेंशन से रिकवरी शुरू कर दी।
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इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि उसने कभी कोई गलत जानकारी नहीं दी और न ही अतिरिक्त भुगतान के पीछे उसकी कोई भूमिका थी। महिला का कहना था कि बैंक की आंतरिक त्रुटियों का खामियाजा उससे वसूला जा रहा है, जबकि वह पूरी तरह बैंकिंग और सरकारी रिकॉर्ड पर निर्भर थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया और पाया कि महिला की ओर से किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, तथ्य छिपाने या गलत दावा करने का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह माना जाए कि याचिकाकर्ता को यह जानकारी थी या उसे पता होना चाहिए था कि उसे उसकी पात्रता से अधिक राशि मिल रही है।
अदालत ने यह भी माना कि बैंक ने रिकवरी प्रक्रिया शुरू करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। महिला को न तो अतिरिक्त भुगतान का पूरा ब्योरा स्पष्ट रूप से दिया गया और न ही रिकवरी के तरीके को लेकर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई गई। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को एकतरफा और अनुचित करार दिया।
न्यायालय ने SBI को निर्देश दिया कि पहले से काटी गई पूरी राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ वापस की जाए। साथ ही भविष्य में किसी भी प्रकार की अतिरिक्त रिकवरी पर भी रोक लगा दी गई। अदालत ने कहा कि पेंशनभोगी, विशेषकर विधवा और वरिष्ठ नागरिक वर्ग, बैंकिंग सिस्टम की तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भरोसा करते हैं। ऐसे में संस्थागत त्रुटियों का भार उन पर नहीं थोपा जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में पेंशन और सरकारी भुगतान से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालतों ने पूर्व में भी कई मामलों में यह टिप्पणी की है कि यदि अतिरिक्त भुगतान कर्मचारी या पेंशनभोगी की गलती से नहीं हुआ है, तो वर्षों बाद अचानक रिकवरी करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
वित्तीय और बैंकिंग मामलों के जानकारों के अनुसार, सरकारी पेंशन सिस्टम में डेटा एंट्री, संशोधन तिथि और स्वचालित गणना से जुड़ी त्रुटियां लंबे समय तक अनदेखी रह जाती हैं। बाद में ऑडिट या पुनर्मूल्यांकन के दौरान जब गड़बड़ी सामने आती है, तब रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है, जिससे पेंशनभोगियों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ता है।
इस फैसले ने एक बार फिर सरकारी बैंकों और पेंशन वितरण प्रणाली में जवाबदेही, पारदर्शिता और त्रुटि-नियंत्रण तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता को उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पेंशन खातों में किसी भी संशोधन या रिकवरी से पहले स्पष्ट नोटिस, विस्तृत गणना और स्वतंत्र सत्यापन की प्रक्रिया अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके।
