RBI रिपोर्ट के अनुसार, देश में डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के 74 प्रतिशत मामले कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े हैं, जिससे साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है।

को-ऑपरेटिव बैंकों में अब नहीं चलेगी ‘स्थायी कुर्सी’: RBI ने डायरेक्टर्स के लिए लागू किया 10 साल का नियम

Team The420
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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से बड़ा नियामकीय बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक ने अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकों (UCBs) और रूरल को-ऑपरेटिव बैंकों (RCBs) के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के लिए नया “कूलिंग-ऑफ पीरियड” लागू करने का फैसला किया है। नए नियम के तहत यदि कोई डायरेक्टर लगातार 10 वर्षों तक किसी को-ऑपरेटिव बैंक के बोर्ड में बना रहता है, तो उसे उसके बाद एक निश्चित अवधि तक बोर्ड से बाहर रहना होगा।

RBI ने इस संबंध में अंतिम संशोधित दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि यह कदम बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट, 1949 की भावना के अनुरूप गवर्नेंस मानकों को मजबूत करने के लिए उठाया गया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि लंबे समय तक एक ही व्यक्ति या समूह का बोर्ड पर बने रहना निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से बोर्ड स्तर पर संतुलन और रोटेशन सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था लागू की गई है।

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दरअसल, RBI ने 8 जनवरी 2026 को इस विषय पर ड्राफ्ट अमेंडमेंट डायरेक्शंस जारी किए थे। ड्राफ्ट में को-ऑपरेटिव बैंकों के बोर्ड संचालन, निदेशकों की भूमिका, जवाबदेही और संस्थागत गवर्नेंस से जुड़े कई प्रस्ताव शामिल थे। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग संस्थानों, विशेषज्ञों और अन्य स्टेकहोल्डर्स से सुझाव और फीडबैक आमंत्रित किए थे। समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब RBI ने संशोधित अंतिम नियमों को अधिसूचित कर दिया है।

जारी किए गए दिशा-निर्देशों में “रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक्स – गवर्नेंस) अमेंडमेंट डायरेक्शंस, 2026” और “रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (रूरल को-ऑपरेटिव बैंक्स – गवर्नेंस) अमेंडमेंट डायरेक्शंस, 2026” शामिल हैं। हालांकि RBI ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि कूलिंग-ऑफ पीरियड कितनी अवधि का होगा, लेकिन इतना साफ कर दिया गया है कि 10 साल लगातार बोर्ड में बने रहने के बाद संबंधित डायरेक्टर को कुछ समय के लिए पद छोड़ना अनिवार्य होगा।

बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यह कदम को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर में लंबे समय से महसूस की जा रही गवर्नेंस कमजोरियों को दूर करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई को-ऑपरेटिव बैंकों में प्रबंधन हस्तक्षेप, बोर्ड नियंत्रण और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठे थे। कुछ मामलों में लंबे समय तक एक ही समूह का प्रभाव बने रहने से संस्थागत स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियम लागू होने से बोर्ड स्तर पर नए चेहरों और पेशेवरों को अवसर मिलेगा। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में विविधता आएगी और संस्थागत जवाबदेही मजबूत होगी। साथ ही जोखिम प्रबंधन, ऑडिट सिस्टम और आंतरिक नियंत्रण तंत्र को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, बोर्ड में नियमित बदलाव से किसी एक व्यक्ति या समूह का अत्यधिक प्रभाव सीमित रहेगा।

को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर देश की ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है। छोटे कारोबारी, किसान, स्वरोजगार से जुड़े लोग और मध्यम वर्गीय ग्राहक बड़ी संख्या में इन बैंकों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में गवर्नेंस ढांचे में सुधार सीधे ग्राहकों के हितों और बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में RBI ने को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए ऑडिट, कैपिटल पर्याप्तता, रिस्क मैनेजमेंट और बोर्ड गवर्नेंस से जुड़े कई नियमों को सख्त किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नया “कूलिंग-ऑफ पीरियड” उसी व्यापक सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके जरिए केंद्रीय बैंक को-ऑपरेटिव बैंकिंग सिस्टम को अधिक पारदर्शी, पेशेवर और जवाबदेह बनाना चाहता है।

फिलहाल RBI के इस फैसले के बाद बैंकिंग सेक्टर में नए गवर्नेंस ढांचे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि जिन को-ऑपरेटिव बैंकों में लंबे समय से एक ही व्यक्ति या समूह का प्रभाव बना हुआ है, वहां आने वाले समय में बोर्ड स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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