झारखंड के एक 25 वर्षीय युवक को साइबर ठगी के मामले में बड़ी राहत देते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि केवल बैंक खाते में पैसे का क्रेडिट हो जाना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक आरोपी की किसी साजिश या धोखाधड़ी में सीधी भूमिका साबित न हो।
यह मामला वर्ष 2022 का है, जिसमें एक पुलिस अधिकारी ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्हें एचडीएफसी बैंक खाते को अपडेट करने के नाम पर एक एसएमएस मिला था, जिसमें पैन कार्ड विवरण मांगा गया था। शिकायत के अनुसार, फिशिंग के इस प्रयास के बाद उनके खाते से ₹99,986 की राशि निकालकर आरोपी मनोज किस्कू के बैंक खाते में ट्रांसफर हो गई थी।
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बैंक रिकॉर्ड से केवल इतना साबित होता है कि रकम आरोपी के खाते में गई थी, लेकिन इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि आरोपी को इस धोखाधड़ी की जानकारी थी या वह किसी संगठित साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा था।
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मजिस्ट्रेट एस. जी. चिमनकर ने 20 मई को दिए आदेश में कहा कि केवल बैंक ट्रांजैक्शन के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने जानबूझकर अपराध में भाग लिया या उसे इसकी जानकारी थी।
अदालत ने यह भी कहा कि बैंक खाते में पैसा किसी भी तीसरे व्यक्ति द्वारा जमा किया जा सकता है, और जब तक जांच एजेंसियां आरोपी और मुख्य साइबर अपराधियों के बीच सीधा संबंध साबित नहीं करतीं, तब तक आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
सुनवाई के दौरान आरोपी ने लगातार यह दावा किया कि उसे खाते में आए पैसे की कोई जानकारी नहीं थी और वह किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी में शामिल नहीं है। अदालत ने पाया कि इस दावे को खारिज करने के लिए अभियोजन के पास कोई ठोस सबूत नहीं है।
यह फैसला साइबर अपराध मामलों में एक अहम उदाहरण माना जा रहा है, जहां अक्सर “म्यूल अकाउंट” यानी अनजाने में इस्तेमाल होने वाले बैंक खातों का इस्तेमाल ठगों द्वारा किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में केवल फाइनेंशियल ट्रेल ही नहीं, बल्कि डिजिटल और तकनीकी सबूतों की भी गहराई से जांच जरूरी होती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर फ्रॉड में पैसे कई खातों से होकर तेजी से गुजरते हैं, जिससे असली अपराधी तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कई बार आम खातेधारक बिना जानकारी के इस पूरे नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं।
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी दोहराया कि किसी व्यक्ति को सिर्फ संदेह या वित्तीय लेन-देन के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए स्पष्ट साक्ष्य, संचार रिकॉर्ड या साजिश में भागीदारी का प्रमाण होना अनिवार्य है।
फैसले के बाद यह भी स्पष्ट हुआ कि जांच एजेंसियों को अब केवल बैंक डिटेल्स पर निर्भर रहने के बजाय आईपी ट्रेसिंग, डिवाइस लॉग्स, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल फॉरेंसिक जैसे तकनीकी साक्ष्यों पर अधिक ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों ने कहा कि यह निर्णय एक ओर जहां निर्दोष लोगों को राहत देता है, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए जांच प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत को भी उजागर करता है।
अदालत ने अंत में आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ कोई भी ठोस आपराधिक कड़ी स्थापित करने में असफल रहा।
