नई दिल्ली। देश में दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) ने अप्रैल 2026 के अपने नियमित ड्रग सर्विलांस अभियान में एक लीवर संबंधी दवा के बैच को “स्प्यूरियस” यानी संदिग्ध/नकली घोषित किया है, जबकि 169 अन्य दवाओं और फार्मूलेशनों को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” (NSQ) पाया गया है। इस खुलासे के बाद दवा उद्योग, अस्पतालों और मरीजों के बीच चिंता बढ़ गई है।
CDSCO की ओर से जारी मासिक ड्रग अलर्ट रिपोर्ट के मुताबिक, जिस दवा के बैच को स्प्यूरियस बताया गया है वह “उर्सोडिऑक्सिकोलिक एसिड टैबलेट्स” है। यह दवा आमतौर पर गॉलब्लैडर में पथरी घोलने और लीवर से जुड़ी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल की जाती है। रिपोर्ट में कहा गया कि यह बैच बिहार में जांच के दौरान पकड़ा गया।
हालांकि नियामक संस्था ने दवा के ब्रांड नाम या संबंधित निर्माता का नाम सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन यह जरूर बताया कि लेबल पर जिस कंपनी का नाम दर्ज था, उसने जांच एजेंसियों को सूचित किया कि संबंधित बैच उनकी ओर से निर्मित नहीं किया गया था। इसी आधार पर उस बैच को स्प्यूरियस यानी नकली श्रेणी में रखा गया।
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जांच रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में कुल 169 दवाओं के नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें से 42 सैंपल केंद्रीय प्रयोगशालाओं में और 129 सैंपल राज्य स्तरीय लैब्स में जांचे गए थे। विशेषज्ञों का कहना है कि NSQ श्रेणी में आने का मतलब यह नहीं होता कि दवा पूरी तरह नकली है, लेकिन उसकी गुणवत्ता निर्धारित फार्माकोपियल मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई। ऐसी दवाओं में सक्रिय तत्वों की मात्रा कम-ज्यादा हो सकती है या उनकी प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि इस तरह के मामलों से मरीजों के इलाज पर सीधा असर पड़ सकता है। विशेष रूप से लीवर, हृदय, एंटीबायोटिक और गंभीर रोगों से जुड़ी दवाओं में गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। कई बार मरीजों को अपेक्षित फायदा नहीं मिलता, जबकि कुछ मामलों में साइड इफेक्ट्स और जटिलताएं भी बढ़ सकती हैं।
फार्मा इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में शामिल है और ऐसे में गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उनका मानना है कि नकली या घटिया दवाओं के खिलाफ सख्त निगरानी, सप्लाई चेन ट्रैकिंग और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। कई मामलों में नकली दवाएं छोटे वितरण नेटवर्क, अनधिकृत सप्लायर्स और कमजोर निरीक्षण व्यवस्था के जरिए बाजार तक पहुंच जाती हैं।
CDSCO समय-समय पर बाजार से दवाओं के सैंपल लेकर उनकी जांच करता है और असफल पाए गए उत्पादों की सूची सार्वजनिक करता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवा कंपनियों को गुणवत्ता मानकों का पालन करने के लिए बाध्य करना है। नियामक एजेंसियां राज्य ड्रग कंट्रोल विभागों के साथ मिलकर बाजार से संदिग्ध बैच हटाने और आगे की जांच की कार्रवाई करती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों को बिना पंजीकृत मेडिकल स्टोर या अनधिकृत ऑनलाइन स्रोतों से दवाएं खरीदने से बचना चाहिए। दवा खरीदते समय बैच नंबर, एक्सपायरी डेट और पैकेजिंग की जांच करना भी जरूरी माना जाता है। यदि किसी दवा के सेवन के बाद असामान्य प्रभाव दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सक और संबंधित ड्रग कंट्रोल विभाग को सूचना देने की सलाह दी गई है।
देश में दवा गुणवत्ता को लेकर लगातार सामने आ रहे मामलों ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि फार्मास्यूटिकल सप्लाई चेन की निगरानी और सख्त प्रवर्तन व्यवस्था आने वाले समय में स्वास्थ्य प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकती है।
