कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण योजना ‘लखपति दीदी’ के तहत बड़े वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया है। यहां 45 महिला स्वयं सहायता समूहों के कथित रूप से करीब ₹40 लाख की राशि लेने के बाद गायब हो जाने की जानकारी सामने आई है। मामले के उजागर होने के बाद प्रशासन ने रिकवरी अभियान शुरू कर दिया है और पूरे नेटवर्क की जांच तेज कर दी गई है।
जानकारी के अनुसार ये स्वयं सहायता समूह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत गठित किए गए थे, जिनका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को छोटे व्यवसायों के जरिए आत्मनिर्भर बनाना था। योजना के तहत इन समूहों को डेयरी, सिलाई, पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे कार्यों के लिए शुरुआती फंड और आगे ऋण सुविधा दी गई थी। लेकिन जांच में पाया गया कि कई समूहों ने फंड लेने के बाद कोई वास्तविक आर्थिक गतिविधि शुरू ही नहीं की।
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प्रारंभिक जांच में सामने आया कि इन समूहों को चरणबद्ध तरीके से वित्तीय सहायता दी गई थी, जिसमें शुरुआती कार्यशील पूंजी और बाद में प्रदर्शन के आधार पर अतिरिक्त ऋण शामिल था। हालांकि, कई मामलों में न तो कारोबार शुरू हुआ और न ही किसी तरह की वापसी या वित्तीय लेन-देन दर्ज हुआ, जिसके चलते बैंक खातों को एनपीए घोषित करना पड़ा।
जिला स्तर पर हुई नियमित समीक्षा के दौरान यह अनियमितताएं उजागर हुईं। कई समूहों के कार्यालय बंद मिले, जबकि कई समूहों के संपर्क नंबर और पते भी निष्क्रिय पाए गए। बैंक रिकॉर्ड में भी लंबे समय से किसी प्रकार की गतिविधि दर्ज नहीं थी, जिससे फंड के दुरुपयोग की आशंका और मजबूत हो गई।
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार जिले में कुल 6,000 से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनसे हजारों महिलाएं जुड़ी हैं और कई समूह सफलतापूर्वक अपना कारोबार भी चला रहे हैं। लेकिन इस मामले ने निगरानी और मूल्यांकन प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
सबसे अधिक निष्क्रिय समूह कुछ विकास खंडों में पाए गए हैं, जहां निरीक्षण के दौरान कई समूहों का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं मिला। अधिकारियों को संदेह है कि या तो योजना के कार्यान्वयन में गंभीर लापरवाही हुई या फिर फंड का सुनियोजित तरीके से दुरुपयोग किया गया।
अब बैंकिंग संस्थानों और ग्रामीण विकास विभाग की संयुक्त टीमें गांव-गांव जाकर सत्यापन अभियान चला रही हैं। जिन समूहों के खिलाफ अनियमितता पाई जाएगी, उनके खिलाफ नोटिस और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं सरकारी ऋण आधारित कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को दर्शाती हैं। उन्होंने सुझाव दिया है कि फंड वितरण और उपयोग की रियल-टाइम मॉनिटरिंग प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि इस तरह के मामलों को रोका जा सके।
फिलहाल जांच जारी है और अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में और भी तथ्य सामने आ सकते हैं, जिससे इस पूरे फंड हेराफेरी नेटवर्क की परतें खुलने की संभावना है।
