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माइक्रोसॉफ्ट की बड़ी साइबर कार्रवाई: रैनसमवेयर गिरोहों को ‘वैध सॉफ्टवेयर’ का मुखौटा पहनाने वाली साइनिंग सर्विस ध्वस्त

Team The420
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नई दिल्ली। Microsoft ने वैश्विक साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए एक अत्याधुनिक “Malware-Signing-as-a-Service” (MSaaS) ऑपरेशन को ध्वस्त करने का दावा किया है। कंपनी के अनुसार “Fox Tempest” नामक यह साइबर नेटवर्क रैनसमवेयर गिरोहों और मालवेयर ऑपरेटरों को ऐसा प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रहा था, जिसके जरिए दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर को वैध एप्लिकेशन जैसा दिखाकर दुनियाभर के सिस्टम और कॉर्पोरेट नेटवर्क में पहुंचाया जा रहा था। माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि यह नेटवर्क 2025 से सक्रिय था और हजारों सिस्टम प्रभावित करने वाले कई साइबर हमलों से जुड़ा हुआ पाया गया।

कंपनी के मुताबिक साइबर अपराधियों ने माइक्रोसॉफ्ट की Artifact Signing प्रणाली का दुरुपयोग कर फर्जी डिजिटल सर्टिफिकेट हासिल किए। इन सर्टिफिकेट्स की मदद से मालवेयर को डिजिटल रूप से साइन किया जाता था, जिससे वह ऑपरेटिंग सिस्टम और सुरक्षा प्लेटफॉर्म को वैध सॉफ्टवेयर जैसा दिखाई देता था। इसी तकनीक का इस्तेमाल कर हमलावर रैनसमवेयर, डेटा चोरी करने वाले मालवेयर और रिमोट एक्सेस टूल्स को सुरक्षा जांच से बचाकर सिस्टम में पहुंचाने में सफल हो रहे थे।

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माइक्रोसॉफ्ट के Digital Crimes Unit ने बताया कि “OpFauxSign” नाम से चलाए गए इस अभियान के तहत signspace[.]cloud डोमेन को जब्त किया गया, ऑपरेशन से जुड़ी सैकड़ों वर्चुअल मशीनों को बंद किया गया और उस बैकएंड इंफ्रास्ट्रक्चर को भी ध्वस्त किया गया जिसके जरिए यह मालवेयर-साइनिंग नेटवर्क संचालित हो रहा था।

जांच में सामने आया कि यह पूरा नेटवर्क एक व्यावसायिक अंडरग्राउंड सेवा की तरह काम कर रहा था। साइबर अपराधी ग्राहक अपने दुर्भावनापूर्ण executable फाइल अपलोड करते थे और बदले में उन्हें डिजिटल रूप से साइन किए गए मालवेयर मिलते थे, जो उपयोगकर्ताओं और सुरक्षा सॉफ्टवेयर दोनों को असली प्रतीत होते थे। बाद में इन्हीं साइन किए गए फाइलों को Microsoft Teams, AnyDesk, PuTTY और Cisco Webex जैसे भरोसेमंद एप्लिकेशन के रूप में फैलाया जाता था।

माइक्रोसॉफ्ट ने इस ऑपरेशन को Rhysida रैनसमवेयर सहित Oyster, Lumma Stealer और Vidar जैसे मालवेयर अभियानों से भी जोड़ा है। जांचकर्ताओं ने Fox Tempest के संबंध INC, Qilin, BlackByte और Akira जैसे कुख्यात रैनसमवेयर नेटवर्क से जुड़े सहयोगियों के साथ भी पाए हैं। इन साइबर हमलों का असर अमेरिका, फ्रांस, भारत और चीन के हेल्थकेयर संस्थानों, सरकारी विभागों, वित्तीय सेवाओं और शिक्षा संगठनों तक देखा गया।

कंपनी ने खुलासा किया कि फर्जी सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए साइबर अपराधियों ने अमेरिका और कनाडा के लोगों की चोरी की गई डिजिटल पहचान का इस्तेमाल किया। इसके जरिए वे माइक्रोसॉफ्ट की पहचान सत्यापन प्रक्रिया को पार कर वैध साइनिंग क्रेडेंशियल प्राप्त कर लेते थे। ये फर्जी सर्टिफिकेट आमतौर पर लगभग 72 घंटे तक सक्रिय रहते थे, जिसके बाद अपराधी नए क्रेडेंशियल का इस्तेमाल शुरू कर देते थे।

जांच एजेंसियों के अनुसार फरवरी 2026 के बाद इस साइबर नेटवर्क ने अपनी तकनीकी संरचना को और अधिक उन्नत बना लिया। अपराधियों ने Cloudzy प्लेटफॉर्म के जरिए पहले से कॉन्फिगर किए गए वर्चुअल मशीन उपलब्ध कराने शुरू कर दिए, जिससे ग्राहक सीधे हमलावरों के सर्वर पर फाइल अपलोड कर साइन किए गए मालवेयर प्राप्त कर सकते थे। माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार इस सेवा के लिए ग्राहकों से ₹4.2 लाख से ₹7.5 लाख तक वसूले जाते थे।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सिग्नेचर सिस्टम का दुरुपयोग वैश्विक सॉफ्टवेयर सुरक्षा ढांचे के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है, क्योंकि ऑपरेटिंग सिस्टम और एंटरप्राइज सुरक्षा प्लेटफॉर्म डिजिटल सर्टिफिकेट पर भरोसा करते हैं। एक Researcher at Algoritha Security के अनुसार “trusted malware delivery” मॉडल यह दिखाता है कि साइबर अपराधी अब डिजिटल ट्रस्ट आर्किटेक्चर को ही निशाना बना रहे हैं, जिससे भविष्य में साइन किए गए मालवेयर हमलों का खतरा और बढ़ सकता है।

माइक्रोसॉफ्ट ने यह भी बताया कि जांच के दौरान कंपनी ने सबूत जुटाने के लिए गुप्त रूप से इस सेवा को खरीदकर उसका परीक्षण किया। कंपनी के अनुसार Fox Tempest लगातार अपनी रणनीति और इंफ्रास्ट्रक्चर बदल रहा था। जब भी फर्जी अकाउंट बंद किए जाते या सर्टिफिकेट रद्द किए जाते, नेटवर्क वैकल्पिक साइनिंग प्लेटफॉर्म की ओर शिफ्ट होने की कोशिश करता था।

कंपनी ने चेतावनी दी कि जब साइबर अपराधी दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर को वैध एप्लिकेशन जैसा दिखाने लगते हैं, तो इससे पूरी डिजिटल ट्रस्ट व्यवस्था प्रभावित होती है, जिस पर व्यवसाय, सरकारें और आम उपभोक्ता निर्भर रहते हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि ऐसे नेटवर्क को ध्वस्त करना साइबर अपराध की लागत बढ़ाने और वैश्विक साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है।

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