नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेज विस्तार ने बीमा सेक्टर के सामने एक नया और अधिक जटिल साइबर खतरा खड़ा कर दिया है। पारंपरिक फिशिंग, रैनसमवेयर और डेटा लीक जैसे जोखिमों से निपटने के लिए वर्षों से तैयार किए गए सुरक्षा ढांचे अब AI-आधारित फ्रॉड और अत्याधुनिक साइबर हमलों के सामने कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। इसी स्थिति को देखते हुए बीमा नियामक संस्था IRDAI ने देश की सभी बीमा कंपनियों से उनकी साइबर सुरक्षा तैयारियों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
सूत्रों के अनुसार, IRDAI ने एक एडवाइजरी ईमेल के माध्यम से कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे AI से जुड़े साइबर जोखिमों, उनकी कमजोरियों और प्रतिक्रिया क्षमता का आकलन कर विस्तृत स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। कंपनियों को 22 मई तक यह रिपोर्ट जमा करनी होगी। इस कदम को नियामक की एक “प्रोएक्टिव सुपरविजन” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य संभावित खतरे के वास्तविक संकट बनने से पहले ही उसका मूल्यांकन करना है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा कंपनियां अभी भी पुराने सुरक्षा मॉडल पर निर्भर हैं, जबकि AI तकनीक ने जोखिम की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। अंडरराइटिंग, क्लेम प्रोसेसिंग और ग्राहक सेवाओं में AI के बढ़ते उपयोग ने जहां प्रक्रियाओं को तेज किया है, वहीं डेटा और सिस्टम की संवेदनशीलता भी कई गुना बढ़ा दी है।
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अब खतरा सिर्फ हैकिंग या डेटा चोरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि AI-जनरेटेड फर्जी क्लेम, सिंथेटिक पहचान और एडवांस्ड डॉक्यूमेंट मैनिपुलेशन जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें मेडिकल रिपोर्ट, वाहन क्षति की तस्वीरें और पहचान दस्तावेज तक AI टूल्स की मदद से बदले जा रहे हैं, जिससे बीमा कंपनियों के लिए वास्तविक और फर्जी दावों में अंतर करना कठिन हो रहा है।
दूसरी ओर, हाल के वर्षों में कई बड़े डेटा ब्रेच ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है। स्टार हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़े एक बड़े डेटा लीक में करोड़ों ग्राहकों की निजी जानकारी सार्वजनिक होने की घटना ने पूरे सेक्टर को झकझोर दिया था। इसके अलावा कुछ अन्य बीमा कंपनियों पर हुए साइबर हमलों ने भी सिस्टम की कमजोरियों को उजागर किया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बीमा सेक्टर में डिजिटल डाटा का विशाल भंडार मौजूद है, जिसमें करोड़ों पॉलिसीधारकों की जानकारी शामिल है। हेल्थ इंश्योरेंस, जो इस सेक्टर का सबसे बड़ा हिस्सा है, अकेले ही करोड़ों ग्राहकों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में AI-आधारित साइबर हमले का प्रभाव बेहद व्यापक और विनाशकारी हो सकता है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि मौजूदा साइबर सुरक्षा गाइडलाइंस तकनीकी रूप से मजबूत जरूर हैं, लेकिन वे AI-विशिष्ट जोखिमों जैसे मॉडल बायस, एडवर्सेरियल अटैक और ऑटोमेटेड डिसीजन सिस्टम की खामियों को स्पष्ट रूप से कवर नहीं करतीं। इससे एक बड़ा नियामकीय अंतर पैदा हो गया है।
कानूनी और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक हमलावरों को भी तेज और अधिक सटीक बना रही है। अब साइबर अपराधी घंटों में कमजोरियों की पहचान कर सकते हैं और उसी गति से उन्हें एक्सप्लॉइट भी कर सकते हैं, जो पहले हफ्तों या महीनों में संभव था।
इसी बीच बीमा कंपनियों को अपने आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर, थर्ड पार्टी वेंडर जोखिम और डेटा गवर्नेंस सिस्टम को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। रेगुलेटर का यह कदम इस दिशा में पहला बड़ा संकेत माना जा रहा है कि आने वाले समय में AI-विशिष्ट सुरक्षा मानकों को भी अनिवार्य किया जा सकता है।
उद्योग के जानकारों के मुताबिक, यह पूरा मूल्यांकन केवल एक अनुपालन प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भविष्य में बनने वाले AI-रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की नींव भी हो सकता है। जैसे-जैसे बीमा सेक्टर डिजिटल और AI-ड्रिवन होता जा रहा है, वैसे-वैसे जोखिम का स्वरूप भी बदल रहा है, और इसी बदलाव के अनुरूप सुरक्षा ढांचे को भी अपडेट करना अब अनिवार्य हो गया है।
