कानपुर में फर्जी डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट सप्लाई करने वाले रैकेट का खुलासा, दो आरोपी गिरफ्तार।

कानपुर में फर्जी डिग्री रैकेट का भंडाफोड़: खुद को डॉक्टर बताने वाला इंटर पास आरोपी समेत दो गिरफ्तार

Team The420
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कानपुर। फर्जी डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट तैयार कर देशभर में सप्लाई करने वाले संगठित रैकेट का एसआईटी ने बड़ा खुलासा करते हुए दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में हैदराबाद निवासी मनीष कुमार अग्रवाल और उन्नाव का कोचिंग संचालक अर्जुन यादव शामिल हैं। जांच में सामने आया है कि महज इंटर पास मनीष खुद को डॉक्टर बताकर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का बड़ा कारोबार चला रहा था।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मनीष कुमार हाईस्कूल से लेकर प्रोफेशनल कोर्स तक की फर्जी डिग्रियां तैयार कराने और बेचने में सक्रिय था। उसने पूछताछ में स्वीकार किया कि उसने अब तक करीब 70 फर्जी मार्कशीट और डिग्रियां तैयार करवाईं, जिनमें कई नामी विश्वविद्यालयों के नाम पर तैयार दस्तावेज भी शामिल हैं।

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पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि यह कार्रवाई पहले गिरफ्तार किए गए शैलेंद्र ओझा की डिजिटल चैट और बैंक लेनदेन की जांच के बाद आगे बढ़ी। उसी जांच में मनीष का नाम सामने आया, जिसके बाद एसआईटी ने उसकी लोकेशन ट्रैक कर गिरफ्तारी की। मनीष मूल रूप से राजस्थान के सीकर का रहने वाला है और पहले बीडीएस कोर्स में दाखिला लेने के बावजूद पढ़ाई पूरी नहीं कर सका था। बाद में उसने खुद को डॉक्टरेट डिग्रीधारी बताना शुरू कर दिया।

जांच में यह भी सामने आया कि मनीष दुबई में रहते हुए भी इस नेटवर्क को ऑपरेट कर रहा था। मार्च में भारत लौटने के बाद उसने लगातार अपने ठिकाने बदले और पुणे, गोवा, बेंगलुरु, दिल्ली और फरीदाबाद में छिपता रहा। आखिरकार एसआईटी ने उसे यशोदानगर क्षेत्र से गिरफ्तार किया।

अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे रैकेट में अब तक करीब 16.44 लाख रुपये के वित्तीय लेनदेन की पुष्टि हुई है। वहीं, अर्जुन यादव द्वारा मनीष के खाते में लगभग 20 लाख रुपये ट्रांसफर किए जाने के सबूत भी जांच में मिले हैं। इसी आधार पर अर्जुन को पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में सामने आया कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता था। फर्जी डिग्री और मार्कशीट की मांग व्हाट्सएप के जरिए ली जाती थी, जबकि दस्तावेजों की प्रिंटिंग इंदौर में कराई जाती थी। इस काम में कुछ अन्य लोगों के भी शामिल होने की आशंका है, जिनकी पहचान के लिए जांच जारी है।

मनीष ने जांच टीम को बताया कि यह पूरा डेटा पहले नाम, फोटो, रोल नंबर और यूनिवर्सिटी विवरण के साथ तैयार किया जाता था, जिसे बाद में इंदौर स्थित प्रिंटिंग सेटअप तक भेजा जाता था। पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हुआ है और इसमें शिक्षा से जुड़े कई स्तरों पर धोखाधड़ी की जा रही थी।

जांच में यह भी सामने आया कि मनीष अपनी छवि मजबूत करने के लिए अलग-अलग शहरों में अवॉर्ड शो आयोजित करता था और सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी के साथ तस्वीरें साझा करता था। उसके पास लगभग 60 से अधिक सेलिब्रिटी के साथ तस्वीरें मिली हैं, जिनमें विभिन्न फिल्मी और सामाजिक हस्तियां शामिल हैं। हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सेलिब्रिटी की इस रैकेट में कोई भूमिका नहीं है।

वहीं, अर्जुन यादव पर आरोप है कि वह स्पेशल बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लासेस की आड़ में शिक्षा फ्रेंचाइजी नेटवर्क चला रहा था, जबकि वास्तविक रूप से यह फर्जी दस्तावेज और अवैध शैक्षणिक संचालन से जुड़ा हुआ था।

18 फरवरी को किदवईनगर पुलिस द्वारा जूही क्षेत्र में स्थित ‘शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन’ कार्यालय पर की गई छापेमारी इस पूरे मामले की शुरुआत थी, जहां से 14 विश्वविद्यालयों की हजारों फर्जी मार्कशीट और सर्टिफिकेट बरामद हुए थे। उस समय कई आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई थी, जिसके बाद जांच लगातार आगे बढ़ रही है और नए खुलासे सामने आ रहे हैं।

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