प्रयागराज में साइबर-तकनीक और भावनात्मक धोखे के मेल से हुई एक चौंकाने वाली ठगी का मामला सामने आया है, जिसमें सिविल लाइंस क्षेत्र में एक छोले-भटूरे विक्रेता से करीब ₹99,000 की धोखाधड़ी कर ली गई। यह घटना उस समय हुई जब एक ग्राहक ने पहले खाना खाया और फिर बेहद कम समय में योजनाबद्ध तरीके से डिजिटल भुगतान सिस्टम का इस्तेमाल कर पैसे निकाल लिए।
पीड़ित के अनुसार, घटना उस समय शुरू हुई जब एक युवक उसकी दुकान पर पहुंचा और छोले-भटूरे ऑर्डर किए। खाना खत्म करने के बाद उसने अचानक भावनात्मक कहानी सुनानी शुरू कर दी और कहा कि उसका एक परिचित अस्पताल में भर्ती है तथा तुरंत ₹4,000 की जरूरत है। आरोपी ने भरोसा दिलाया कि वह यह राशि नकद वापस कर देगा, जिससे दुकानदार सहमत हो गया और उसने Google Pay के जरिए ₹4,000 ट्रांसफर कर दिए।
यह पहला ट्रांजैक्शन केवल विश्वास बनाने और ध्यान भटकाने की रणनीति का हिस्सा था। इसके बाद आरोपी ने एक और चाल चलते हुए कहा कि उसका पर्स गाड़ी में छूट गया है और उसे लेने जाना है। उसने दुकानदार से एक कर्मचारी को साथ भेजने का अनुरोध किया। जैसे ही कर्मचारी उसके साथ दुकान से बाहर गया, आरोपी मौके का फायदा उठाकर वहां से फरार हो गया।
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कुछ ही घंटों बाद दुकानदार को अपने बैंक खाते में संदिग्ध गतिविधियों का पता चला। मोबाइल पर आए अलर्ट चेक करने पर सामने आया कि ICICI बैंक से जुड़े उसके Google Pay खाते से अतिरिक्त ₹95,000 की अनधिकृत निकासी हो चुकी थी। इस तरह कुल नुकसान ₹99,000 तक पहुंच गया, जिसमें शुरुआती ₹4,000 भी शामिल थे।
ट्रांजैक्शन डिटेल्स के अनुसार, रकम “Rajeev Pandey” नाम से जुड़े एक UPI हैंडल पर ट्रांसफर की गई थी। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि यह किसी फर्जी या म्यूल अकाउंट नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जिसे साइबर ठगी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पीड़ित ने तुरंत पुलिस से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद साइबर क्राइम जांच शुरू कर दी गई है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह घटना किसी अचानक हुई ठगी का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे पहले से तैयार की गई योजना थी। इसमें भावनात्मक दबाव, भरोसा जीतना, ध्यान भटकाना और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की तेजी का फायदा उठाना शामिल था। पुलिस अब मोबाइल नंबर, बैंक ट्रांजैक्शन और डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।
इसी क्षेत्र में एक अन्य मामले में रिटायर्ड मर्चेंट नेवी अधिकारी से भी सोशल मीडिया पर फर्जी पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर ₹4.2 लाख की ठगी की गई। आरोपी ने ऑनलाइन निवेश का झांसा देकर फर्जी डैशबोर्ड पर बढ़ा हुआ मुनाफा दिखाया और बाद में टैक्स के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगकर संपर्क तोड़ दिया।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी भावनात्मक कहानी और तात्कालिक जरूरत का बहाना बनाकर लोगों को डिजिटल पेमेंट करने के लिए मजबूर करते हैं। खासकर छोटे व्यापारी और सामान्य उपयोगकर्ता ऐसे फ्रॉड के आसान शिकार बन रहे हैं, क्योंकि उन्हें डिजिटल सुरक्षा के तकनीकी पहलुओं की पूरी जानकारी नहीं होती।
अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान व्यक्ति की आपातकालीन मांग पर तुरंत पैसा ट्रांसफर न करें, चाहे वह आमने-सामने ही क्यों न हो। एक बार UPI से पैसा भेजे जाने के बाद उसे वापस पाना बेहद मुश्किल होता है।
फिलहाल पुलिस इस पूरे मामले में लाभार्थी खाते की पहचान और उसके पीछे मौजूद नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस तरह की घटनाएं अन्य जिलों में भी इसी पैटर्न पर हो रही हैं।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि कैसे डिजिटल भुगतान की सुविधा अब अपराधियों के लिए नया हथियार बनती जा रही है, जिसमें भरोसा, भावनाएं और तकनीक—तीनों का इस्तेमाल एक साथ किया जा रहा है।
