पणजी। गोवा में लोक निर्माण विभाग (PWD) से जुड़े करीब ₹1,000 करोड़ के कथित टेंडर घोटाले ने राज्य प्रशासन में हलचल मचा दी है। आरोप है कि कुछ कंपनियों ने फर्जी और संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर बड़े सरकारी ठेके हासिल किए, जिससे टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है और पूरे प्रकरण की विस्तृत पड़ताल के आदेश दिए गए हैं।
जानकारी के अनुसार, यह मामला तब सामने आया जब कुछ सिविल इंजीनियरों और PWD ठेकेदारों ने विभागीय अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में दावा किया गया है कि एक निर्माण कंपनी ने जाली या कथित रूप से संशोधित वर्क कंप्लीशन सर्टिफिकेट जमा कर Class IAA कॉन्ट्रैक्टर का दर्जा हासिल किया, जिसके आधार पर उसे बड़े पैमाने पर सरकारी परियोजनाओं के टेंडर मिले।
शिकायत में जिस कंपनी का नाम सामने आया है, उस पर आरोप है कि उसने कर्नाटक नीरावरी निगम लिमिटेड के तहत ‘मुडी टैंक फिलिंग स्कीम’ प्रोजेक्ट से जुड़े दस्तावेजों का गलत उपयोग किया। कहा जा रहा है कि एक ही प्रोजेक्ट के लिए तीन अलग-अलग कंप्लीशन सर्टिफिकेट जमा किए गए, जिससे दस्तावेजी सत्यता पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।
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जांच में यह भी सामने आया है कि 2019 में हुए एक जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट में अमृता कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड को लीड पार्टनर बताया गया था, जबकि दूसरी कंपनी केवल सहयोगी के रूप में शामिल थी। हालांकि, गोवा PWD में जमा किए गए दस्तावेजों में भूमिका को बदलकर बागकिया कंस्ट्रक्शंस को लीड पार्टनर दिखाया गया, जिससे उसकी तकनीकी योग्यता और अनुभव को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने का आरोप लगा है।
इस बदलाव को टेंडर पात्रता नियमों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे कंपनी को ऐसे प्रोजेक्ट्स में भाग लेने का अवसर मिला, जिनके लिए वह संभवतः योग्य नहीं थी। विभागीय सूत्रों का कहना है कि दस्तावेजों में इस तरह के हेरफेर ने पूरी निविदा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक अन्य मामले में कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में स्थित ‘अक्का महादेवी मेमोरियल प्रोजेक्ट’ को लेकर भी गंभीर शिकायत दर्ज की गई है। इस परियोजना की लागत लगभग ₹51.19 करोड़ बताई जा रही है। आरोप है कि इस प्रोजेक्ट को अलग-अलग चरणों में पूरा होने के बावजूद एकल परियोजना के रूप में दर्शाकर लाभ लिया गया, जिससे अनुभव और टर्नओवर की गणना में हेरफेर किया गया।
शिकायतकर्ताओं ने गोवा PWD/WRD-2020 के नियमों का हवाला देते हुए कहा है कि जॉइंट वेंचर के तहत प्राप्त अनुभव को किसी एक साझेदार द्वारा स्वतंत्र रूप से उपयोग नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके बावजूद नियमों को दरकिनार कर टेंडर हासिल किए गए।
सरकारी स्तर पर मामले की गंभीरता को देखते हुए विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि सभी संबंधित दस्तावेजों, अनुबंधों और प्रमाणपत्रों की बारीकी से जांच की जाएगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो आगे कानूनी कार्रवाई और अनुबंध रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई भी संभव है।
इस पूरे विवाद ने गोवा में टेंडर प्रणाली की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स में दस्तावेजों की सत्यता की जांच और डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि इस तरह की अनियमितताओं को रोका जा सके।
फिलहाल राज्य सरकार ने साफ किया है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
